या देवी सर्वभूतेषु…

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके,
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥

सुख, शांति एवं समृद्धि की मंगलमयी कामनाओं के साथ काशी पत्रिका की तरफ से आप सभी को सपरिवार शारदीय नवरात्र की हार्दिक मंगल कामनाएं। इस बार शारदीय नवरात्र का प्रारंभ 10 अक्टूबर, दिन बुधवार को हो रहा है। कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 34 मिनट से 7 बजकर 26 मिनट तक है, लेकिन द्वितीया तिथि का ह्रास होने एवं उदयातिथि में प्रतिपदा के कारण दिन भर घटस्थापना की जा सकती है। वैसे प्रातः 6 बजे से दोपहर 12 बजकर 49 मिनट तक घटस्थापना करना श्रेयस्कर है। महाष्टमी व्रत 17 अक्टूबर उसी दिन दोपहर 12.27 से नवमी लग जाएगी और इसी दौरान हवन किया जा सकेगा। जो 18 अक्टूबर अपराह्न 2.32 तक नवमी समाप्त होगी। इसके बाद दशमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। उसके बाद 9 दिन उपवास वाले अन्न ग्रहण कर पारण करेंगे। विजय दशमी 19 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

प्रथमा तिथि, घटस्थापना
नवरात्रि प्रथमा तिथि घटस्थापना,चन्द्रदर्शन, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी पूजा 10 अक्टूबर 2018 बुधवार
द्वितीया तिथि द्वितीया तिथि का क्षय
तृतीया तिथि सिन्दूर चंद्रघंटा 11 अक्टूबर 2018 वृहस्पतिवार,
चतुर्थी तिथि कुष्मांडा 12 अक्टूबर 2018 शुक्रवार
पंचमी तिथि स्कंदमाता 13 अक्टूबर 2018 शनिवार
पंचमी तिथि सरस्वती आवाहन 14 अक्टूबर 2018 रविवार
षष्ठी तिथि कात्यायनी, सरस्वती पूजा 15 अक्टूबर 2018 सोमवार
सप्तमी तिथि कालरात्रि 16 अक्टूबर 2018 मंगलवार
अष्टमी तिथि महागौरी 17 अक्टूबर 2018 बुधवार
नवमी तिथि सिद्धिदात्री 18 अक्टूबर 2018 वृहस्पतिवार
दशमी तिथि विजयदशमी 19 अक्टूबर 2018 शुक्रवार

अखंड ज्योत का महत्व
नवरात्र में अखंड ज्योत का महत्व: अखंड ज्योत को जलाने से घर में हमेशा मां दुर्गा की कृपा बनी रहती है। नवरात्र में अखंड ज्योत के कुछ नियम होते हैं, जिन्हें नवरात्र में पालन करना होता है। परंपरा है कि जिन घरों में अखंड ज्योत जलाते है उन्हें जमीन पर सोना होता है।

नवरात्र में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा होती है। जानिए इस वर्ष नवरात्र में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजन तिथि:

शारदीय नवरात्रि दुर्गा पूजा 10 अक्टूबर 2018 बुधवार, कलश स्थापना (घटस्थापना) का शुभ मुहूर्त
कलश स्थापना मुहूर्त = 06:22 से 07:25 तक।
मुहूर्त की अवधि = 01 घंटा 02 मिनट।
कलश स्थापना और पूजन के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएं
मिट्टी का पात्र और जौ के 11 या 21 दाने, शुद्ध साफ की हुई मिट्टी जिसमें पत्थर नहीं हो, शुद्ध जल से भरा हुआ मिट्टी, सोना, चांदी, तांबा या पीतल का कलश, मोली (लाल सूत्र) , अशोक या आम के 5 पत्ते, कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन, साबुत चावल, एक पानी वाला नारियल, पूजा में काम आने वाली सुपारी, कलश में रखने के लिए सिक्के, लाल कपड़ा या चुनरी, मिठाई, लाल गुलाब के फूलों की माला।

नवरात्र कलश स्थापना की विधि
महर्षि वेद व्यास से द्वारा भविष्य पुराण में बताया गया है कि कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छे से शुद्ध किया जाना चाहिए। उसके उपरान्त एक लकड़ी के पाटे पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर थोड़े चावल, गणेश भगवान को याद करते हुए रख देने चाहिए। फिर जिस कलश को स्थापित करना है, उसमें मिट्टी भर के और पानी डाल कर उसमें जौ बो देना चाहिए। इसी कलश पर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दें। कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दें और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक दें। ढक्कन को चावल से भर दें। पास में ही एक नारियल जिसे लाल मैया की चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन पर रखें और सभी देवी- देवताओं का आवाहन करें। अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करें। अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दें। अब हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करें।
ध्यान देने योग्य बात:
जो कलश आप स्थापित कर रहे हैं, वह मिट्टी, तांबा, पीतल, सोने या चांदी का होना चाहिए। भूल से भी लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग नहीं करें।

नव का अर्थ नौ तथा अर्ण का अर्थ अक्षर होता है। अतः नवार्ण नवों अक्षरों वाला वह मंत्र है, नवार्ण मंत्र ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे’ है। नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है। नवार्ण मंत्र का जाप 108 दाने की माला पर कम से कम तीन बार अवश्य करना चाहिए।
ब्रह्मांड के सारे ग्रह एकत्रित होकर जब सक्रिय हो जाते हैं, तब उसका दुष्प्रभाव प्राणियों पर पड़ता है। ग्रहों के इसी दुष्प्रभाव से बचने के लिए नवरात्रि में दुर्गा की पूजा की जाती है। आइए जानें मां दुर्गा के नवार्ण मंत्र और उनसे संचालित ग्रह
1 नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ऐं है, जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैल पुत्री से है, जिसकी उपासना ‘प्रथम नवरात्र’ को की जाती है।
2 दूसरा अक्षर ह्रीं है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरे नवरात्रि को होती है।
3 तीसरा अक्षर क्लीं है, चौथा अक्षर चा, पांचवां अक्षर मुं, छठा अक्षर डा, सातवां अक्षर यै, आठवां अक्षर वि तथा नौवा अक्षर चै है। जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु ग्रहों को नियंत्रित करता है।
इन अक्षरों से संबंधित दुर्गा की शक्तियां क्रमशः चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री हैं, जिनकी आराधना क्रमश: तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें नवरात्रि को की जाती है।
इस नवार्ण मंत्र के तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तथा इसकी तीन देवियां महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं, दुर्गा की यह नवों शक्तियां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति में भी सहायक होती हैं।
नवरात्रि का पर्व नौ शक्ति रुपी देवियों के पूजा के लिए है। यह सभी देवी रूप अपने आप में शक्ति और भक्ति के भंडार है। जगत में अच्छाई के लिए माँ का कल्याणकारी रूप सिद्धिदात्री, महागौरी आदि है और इसी के साथ जगत में पनप रही बुराई के लिए माँ कालरात्रि, चन्द्रघंटा रूप धारण कर लेती हैं।
अब जाने वे बीज मंत्र जो इन नौ देवियों को प्रसन्न करते हैं। हर एक देवी का पृथक बीज मंत्र यहाँ दिया गया है।
1. शैलपुत्री : ह्रीं शिवायै नम:
2. ब्रह्मचारिणी : ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:
3. चन्द्रघंटा : ऐं श्रीं शक्तयै नम:
4. कूष्मांडा ऐं ह्री देव्यै नम:
5. स्कंदमाता : ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:
6. कात्यायनी : क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम:
7. कालरात्रि : क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:
8. महागौरी : श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:
9. सिद्धिदात्री : ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:
देवी दुर्गा के नौ रूप कौन-कौन से हैं।
प्रथम् शैल-पुत्री च, द्वितियं ब्रह्मचारिणि
तृतियं चंद्रघंटेति च चतुर्थ कूषमाण्डा
पंचम् स्कन्दमातेती, षष्टं कात्यानी च
सप्तं कालरात्रेति, अष्टं महागौरी च
नवमं सिद्धिदात्ररी।

देवी के विभिन्न रूपों का वर्णन
शैलपुत्री ( पर्वत की बेटी )
वह पर्वत हिमालय की बेटी है और नौ दुर्गा में पहली रूप हैं। पिछले जन्म में वह राजा दक्ष की पुत्री थी। इस जन्म में उसका नाम सती-भवानी था और भगवान शिव की पत्नी। एक बार दक्ष ने भगवान शिव को आमंत्रित किए बिना एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया था। देवी सती वहा पहुँच गईं और तर्क करने लगी। उनके पिता ने उनके पति (भगवान शिव) का अपमान जारी रखा था। सती भगवान् का अपमान सहन नहीं कर पाती और अपने आप को यज्ञ की आग में भस्म कर दी। दूसरे जन्म वह हिमालय की बेटी पार्वती- हेमावती के रूप में जन्म लेती है और भगवान शिव से विवाह करती है।

ब्रह्मचारिणी (तप स्वरूप)

दूसरी उपस्थिति नौ दुर्गा में माँ ब्रह्माचारिणी का है। ” ब्रह्मा ” शब्द उनके लिए लिया जाता है, जो कठोर भक्ति करते हैं और अपने दिमाग और दिल को संतुलन में रख कर भगवान को खुश करते हैं। यहां ब्रह्मा का अर्थ है “तप” । माँ ब्रह्मचारिणी की मूर्ति बहुत ही सुंदर है। उनके दाहिने हाथ में गुलाब और बाएं हाथ में पवित्र पानी के बर्तन (कमंडल) है। वह पूर्ण उत्साह से भरी हुई है। उन्होंने तपस्या क्यों की उसकी एक कहानी है। पार्वती हिमवान की बेटी थी। एक दिन वह अपने दोस्तों के साथ खेल में व्यस्त थी। नारद मुनि उनके पास आये और भविष्यवाणी की कि तुम्हारी शादी एक नग्न भयानक भोलेनाथ से होगी और उन्होंने उसे सती की कहानी भी सुनाई। नारद मुनि ने उनसे यह भी कहा उन्हें भोलेनाथ के लिए कठोर तपस्या भी करनी पड़ेगी। इसीलिए माँ पार्वती ने अपनी माँ मेनका से कहा की वह शम्भू (भोलेनाथ) से ही विवाह करेंगी, नहीं तो वह अविवाहित रहेंगी। यह कहकर वह जंगल में तपस्या करने के लिए चली गईं। इसी लिए उन्हें तपचारिणी ब्रह्मचारिणी कहा जाता है।

चंद्रघंटा (माँ का गुस्से का रूप)
तीसरी शक्ति का नाम है, चंद्रघंटा। जिनके सर पर आधा चन्द्र (चाँद) और बजती घंटी है। वह शेर पर बैठी संघर्ष के लिए तैयार रहती है। उनके माथे में एक आधा परिपत्र चाँद (चंद्र) है। वह आकर्षक और चमकदार हैं। वह 3 आँखों और दस हाथों में दस हथियार पकड़े रहती हैं। उनके हाथों में मौजूद घंटी की भयानक ध्वनि सभी राक्षसों और प्रतिद्वंद्वियों को डरा देती है।

कुष्मांडा (माँ का खुशी भरा रूप)
माँ के चौथे रूप का नाम है कुष्मांडा। ” कु” मतलब थोड़ा “शं” मतलब गरम “अंडा ” मतलब अंडा। यहाँ अंडा का मतलब है ब्रह्मांडीय अंडा। वह ब्रह्मांड की निर्माता के रूप में जानी जाती हैं, जो उनके प्रकाश के फैलने से निर्माण होता है। वह सूर्य की तरह सभी दस दिशाओं में चमकती रहती है। उनकी अष्ट भुजाओं में सात हथियार हैं, जबकि उनके दाहिने हाथ में माला है। मां शेर की सवारी करती हैं।

स्कंदमाता ( माँ के आशीर्वाद का रूप)
देवी दुर्गा का पांचवा रूप है ” स्कंद माता”, हिमालय की पुत्री है। उन्होंने भगवान शिव के साथ शादी कर ली थी। उनका एक बेटा था जिसका नाम “स्कन्दा” था। स्कन्दा देवताओं की सेना का प्रमुख था। स्कंदमाता आग की देवी हैं। स्कन्दा उनकी गोद में बैठा रहता है। उनके त्रिनेत्र और चार भुजाएं हैं। कमल पर बैठी स्कंदमाता सफेद वस्त्र धारण किए हैं और उनके दोनों हाथों में कमल रहता है।

कात्यायनी (माँ दुर्गा की बेटी जैसी)
माँ दुर्गा का छठा रूप है कात्यायनी। एक बार एक महान संत जिनका नाम कता था, जो अपने समय में बहुत प्रसिद्ध थे। उन्होंने देवी माँ की कृपा प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक तपस्या की। उन्होंने देवी के रूप में एक बेटी की आशा व्यक्त की थी। माँ ने उनकी इच्छा को पूरा किया और माँ कात्यानी का जन्म कता के पास हुआ।

कालरात्रि (माँ का भयंकर रूप)
माँ दुर्गा का सातवाँ रूप है कालरात्रि। वह काली रात की तरह है, उनके बाल बिखरे होते है, वह चमकीले भूषण पहनती हैं। उनकी तीन उज्जवल आँखों से हजारों आग की लपटें निकलती है। वह शावा (मृत शरीर ) पर सवारी करती हैं। उनके दाहिने हाथ में उस्तरा तेज- तलवार है। उनका निचला हाथ आशीर्वाद के लिए है। जलती हुई मशाल बाएं हाथ में है। उन्हें “शुभकुमारी” भी कहा जाता है जिसका मतलब है, जो हमेश अच्छा करती हैं।

महागौरी (माँ पार्वती का रूप और पवित्रता का स्वरूप)
आठवीं दुर्गा “महा गौरी” हैं। वह एक शंख, चंद्रमा और जैस्मीन के रूप सी सफेद हैं। आठ वर्षीय माता के वस्त्र और गहने सफेद और साफ होते हैं। उनकी तीन नेत्र हैं और उनकी सवारी बैल है। चार भुजाओं वाली माता के निचले बाएं हाथ की मुद्रा निडर है। ऊपर के बाएं हाथ में ” त्रिशूल ” है। ऊपर के दाहिने हाथ डफ है और निचला दाहिना हाथ आशीर्वाद शैली में है। मां गौरी के बारे में एक कथा है कि जब माँ गौरी का शरीर धूल के कारण गंदा हो गया था, तो भगवान शिव ने गंगा के जल से उसे साफ किया था। तब उनका शरीर बिजली की तरह उज्ज्वल बन गया, इसीलिए उन्हें महागौरी कहा जाता है। यह भी कहा जाता है जो भी महागौरी की पूजा करता है, उसके वर्तमान, अतीत और भविष्य के पाप धुल जाते हैं।

सिद्धिदात्री (माँ का ज्ञानी रूप)
माँ का नौवा रूप है ” सिद्धिदात्री”। यह आठ सिद्धिः रूप है, जो है अनिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य,लिषित्वा और वशित्व। माँ शक्ति यह सभी सिद्धिः देती है। उनके पास कई अबुद्ध शक्तियां हैं। यह कहा जाता है,”देवीपुराण” में भगवान शिव को यह सब सिद्धिः मिली है, महाशक्ति की पूजा करने से। उनकी कृतज्ञता के साथ शिव का आधा शरीर देवी का बन गया था और वह “अर्धनारीश्वर” के नाम से प्रसिद्ध हो गए। माँ सिद्धिदात्री की सवारी शेर है। चार भुजाओं वाली देवी की यह मुद्रा अत्यंत प्रसन्न है। दुर्गा का यह रूप धार्मिक रूप से सबसे प्रसिद्ध है, जिसे सभी देवताओं, ऋषियों, सिद्ध, योगियों, संतों और श्रद्धालुओं के द्वारा पूजा जाता है।

दुर्गा सप्तशती के चमत्कारी मंत्र
1. आपत्त्ति से निकलने के लिए
शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तुते ॥
2 भय का नाश करने के लिए
सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिमन्विते।
भये भ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तुते॥
3 जीवन के पापों को नाश करने के लिए
हिनस्ति दैत्येजंसि स्वनेनापूर्य या जगत्। सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव॥
4 बीमारी महामारी से बचाव के लिए
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभिष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति॥
5 पुत्र रत्न प्राप्त करने के लिए देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥
6 इच्छित फल प्राप्ति एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः
7 महामारी के नाश के लिए
जयन्ती मड्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥
8 शक्ति और बल प्राप्ति के लिए
सृष्टि स्तिथि विनाशानां शक्तिभूते सनातनि। गुणाश्रेय गुणमये नारायणि नमोस्तुते॥
9 इच्छित पति प्राप्ति के लिए
ॐ कात्यायनि महामाये महायेगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुते देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
10 इच्छित पत्नी प्राप्ति के लिए
पत्नीं मनोरामां देहि मनोववृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसार-सागरस्य कुलोभ्दवाम्॥
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Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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