वो जब भी चाहे बड़े शौक से जलाए मुझे

यह मोजजा(1)भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे,
कि संग तुझ पे गिरे और जख्म आए मुझे।
मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को,
बदन मेरा ही सही दोपहर न भाए मुझे।
ब-रंग-ए-ऊद(2) मिलेगी उसे मेरी खुश्बू,
वो जब भी चाहे बड़े शौक से जलाए मुझे।
मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ,
बरह्ना(3) शहर में कोई नजर न आए मुझे।
वही तो सब से ज्यादा है नुक्ताचीं मेरा,
जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाए मुझे।
मैं अपने दिल से निकालूँ ख्याल किस-किस का,
जो तू नहीं तो कोई और याद आए मुझे।
जमाना दर्द के सहरा तक आज ले आया,
गुजार कर तेरी जुल्फों के साए-साए मुझे।
वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम,
दगा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे।
वो मेहरबाँ है तो इकरार क्यों नहीं करता,
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आजमाए मुझे।
मैं अपनी जात में नीलाम हो रहा हूँ ‘कतील’
गम-ए-हयात से कह दो खरीद लाए मुझे।
■ कतील शिफाई
शब्दार्थ प्रतिबन्ध1, अगरबती की तरह2,
 नंगा, खालील3

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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