मैं नजर से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी…

गम-ए-आशिकी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे,
मुझे खौफ है ये तोहमत तेरे नाम तक न पहुँचे।

मैं नजर से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी,
तेरा हाथ जिंदगी भर कभी जाम तक न पहुँचे।

वो नवा-ए-मुज्महिल क्या न हो जिस में दिल की धड़कन,
वो सदा-ए-अहल-ए-दिल क्या जो अवाम तक न पहुँचे।

मेरे ताइर-ए-नफस को नहीं बागबाँ से रंजिश,
मिले घर में आब-ओ-दाना तो ये दाम तक न पहुँचे।

नई सुब्ह पर नजर है मगर आह ये भी डर है,
ये सहर भी रफ्ता रफ्ता कहीं शाम तक न पहुँचे।

ये अदा-ए-बे-नियाजी तुझे बेवफा मुबारक,
मगर ऐसी बे-रुखी क्या कि सलाम तक न पहुँचे।

जो नकाब-ए-रुख उठा दी तो ये कैद भी लगा दी,
उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे।

उन्हें अपने दिल की खबरें मेरे दिल से मिल रही हैं,
मैं जो उन से रूठ जाऊँ तो पयाम तक न पहुँचे।

वही इक खमोश नग्मा है ‘शकील’ जान-ए-हस्ती,
जो जबान पर न आए जो कलाम तक न पहुँचे।
■ शकील बदायुनी

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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