रंग-ए-बनारस

हर रंग गुलिस्तां है हर रंग शरारा है
ये रंग-ए-बनारस है ये रंग-ए-करारा है

जी हां, यह बनारस ही है, जिसके रग-रग में कितने रंग हैं, किसी को नहीं पता। रंगों की मशहूर दुनिया भी शायद खुद को बनारस में पाकर अपना अस्तित्व भूल जाती है, तभी तो बनारस के शिव अपने बनारसियों में ही रंगमय हो लीन रहते हैं। मौसम होली का है, तो यह अनपढ़ भी बनारस की गलियों-घाटों से गुजरती रंगों की टोली में गुम सा गया है। जेहन में रंग-ए-बनारस और बनारसी रंग का इतना घालमेल हो गया कि अनपढ़ की कलम भी रंगरेज हो गई। ये अलग बात है कि अनपढ़ और रंगरेजी का नाता ‘लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर’ जैसा ही है, फिर भी गुमान इतना जैसे पढ़े-लिखों की क्या बिसात। खैर, यही तो है भदेसपन, जो हम बनारसियों की थाती है। तो चलिए, करते हैं दीदार-ए-बनारस होरियारे अंदाज में…

बनारस की हर अदा रंगीन है। यहां होली बनारस की हो न हो, होली का बनारस पक्का है। इसका करेक्टर ही ऐसा है कि विश्वनाथजी यहां साल भर क्षणा-क्षण इसके विविध रंगों में डूबे रहते हैं। यहां हर त्योहार शिव से शुरू हो, शिव पर ही खत्म होता है, तभी तो बनारसियों का मोह बनारस से शुरू हो बनारस में ही खत्म हो जाता है। बनारस की होली भी शिव से शिव में समाई शिवाकार हो जाती है। जी हां, शिवरात्रि को शिव-विवाह होता है, तो रंगभरी एकादशी को शिवजी की दुल्हन पार्वतीजी का ससुराल आगमन, यानी गौवना (गउना) होता है। यही से शुरू हुआ होलिकोत्सव रंगपंचमी के बाद बुढ़वामंगल (रंगपंचमी के बाद आने वाले मंगलवार) तक चलता है। भांग, पान, ठंडाई में घुली बनारसियों की अल्हड़ मस्ती ही यहां होली की जीवंतता है। विशुद्ध देसी संस्कृति में डूबी बाबा की नगरी अपनी फाल्गुनी बयार से गली-मुहल्लों, गंगाघाटों तक सौहार्द में लिपटे बनारसियों के अलमस्त अंदाज का बखूबी अहसास कराती है। सुरीली धुनों में होली गीतों की फुहार लिए होरियारों की ऊर्जामय खुमारी विदेशी सैलानियों तक को अपने रंग में ढाल लेती है।
फाग का रंग और सुबह-ए-बनारस का प्रगाढ़ रिश्ता होली में खूब दिखता है। गुझिया, मालपुआ, जलेबी और विविध मिठाइयों-नमकीनों की खुशबू के बीच रसभरी अक्खड़मिजाजी और बिना रंगे किसी को न छोड़ने की ललक बनारस ही तो है। गंगा-घाटों, मंदिरों, गलियों-गालियों से लबरेज इस उम्दा शहर का जेहन पुरातनता, पौराणिकता, धार्मिकता, संस्कृति, साड़ी, गलीचे, भांग-पान और लंगड़ा आम आदि विशेषणों से लबरेज है। होली के रंगों में इन सबका शामिल होना भोलेनाथ को भी खूब सुहाता है, तभी तो बनारसी होली के विविध पहलू हैं, जिसमें ‘होली बारात’ भी शामिल है। यहां मुकीमगंज से बाकायदा बैंडबाजे के साथ ढोल-नगाड़ों की थाप पर मदमस्त फाग गाते बनारसी बारात निकालते हैं। भांग की ठंडाई में मस्त बाराती और रथ पर सवार दूल्हा जब गन्तव्य पर पहुंचता है, तो वहां परंपरागत तरीके से महिलाएं परछन करती हैं। बाकायदा सजे मंडप में वर-वधु के बीच शास्त्रार्थ होता है और देर शाम दुल्हन के शादी से इंकार के बाद हंसी-ठिठोली के बीच बारात लौट जाती है।
यहां के प्रसिद्ध अस्सी-घाट के बहुचर्चित कवि सम्मेलन का जिक्र किए बिना बनारसी होली अधूरी है। अब तो तमाम पाबंदियां हो गईं, लेकिन एक समय था जब यहां चकाचक बनारसी, पं. धर्मशील चतुर्वेदी, सांड़ बनारसी, बदरी विशाल, बेधड़क बनारसी, बेढब बनारसी जैसे धाकड़ कवि मंचासीन होते थे। गाली-गलौज से भरपूर हास्य फुहारों के बीच मंत्री-संतरी से लेकर जज-कलेक्टर, सरकार तक सबकी बखिया उधेड़ी जाती थी और हंसी-मजाक के बीच संस्कृति-समाज एवं राष्ट्र की तत्कालिक गतिविधियों से रू-ब-रू कराया जाता था। वक्त ने बहुत कुछ बदला, लेकिन खान-पान और खातिरदारी का सदियों पुराना रिवाज आज भी बनारसी बखूबी निभाते हैं। गीत-संगीत के बिना बनारसी होली अधूरी है- चैती, होरी, ठिठोरी, चुहल, कजरी, बेलवइयां, जोगीरा आदि लोकगीतों की वरायटी होली को आज भी जीवंत किए हुए है।
कुछ होली गीतों की पहली लाइन-
● कउने कारन सइयां भइले जोगिया हो रामा.. कउने करनवा..।
● पतझड़ बीता प्रियतम आए, बसंत आया और नजाकत भरी होली..।
● होरी खेलन कइसे जाऊं सखी री.. हरि हाथन पिचकारी रहत है..।
● रंग डारूंगी रंग डारूंगी, नन्दलालन पै रंग डारूंगी..।
● सांवरे ने रंग डारी.. सखी रे मैंने कछु ना कही.. सांवरे ने..।
● जोगीरा सा र.. र.. र.. र.. जोगीरा सा र.. र.. र.. र.. वाह खिलाड़ी वा.. वा खिलाड़ी वा..।

सच तो ये है जनाब कि बनारस की होली को शब्दों में समेकित करना किसी के बूते का नहीं है। यह अपने आप में समूचा अध्यात्म, दर्शन, कला और संस्कृति समेटे हुए है। विश्वपटल पर यूं ही नहीं कहते- “जिया रजा बनारस..”! इसकी तमाम वजहें हैं, बनारस को जीना है तो यहां वक्त गुजरना होगा, इसमें रमना होगा, डूबना होगा और इसी में खो जाना होगा।


कितने आए चले गए, तू शाम सवेरे बनी रहे
हम तुझमें खो गए रे काशी, तू धुनी रमाए बनी रहे
तन मेरा खोया मन मेरा, तू मुझमें बारंबार रहे
तुझसा न बन पाए काशी, तू मुझमें जो बनी रहे
रंगों का आना और खो जाना, ये कैसा उत्कर्ष हुआ
तुझ पर न चढ़ पाएं वो रंग, तू रंगों सी बनी रहे।

■ कृष्णस्वरूप

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Post Author: kashipatrika

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