चहु ओर विकास है, बुद्धिजीवी उदास है, निराश है…!!!

भारतीयों से निवेदन: व्यस्ततम जिंदगी से दो पल निकालकर कृपया दो मिनट का मौन रखें, लोकतंत्र में लिखने-बोलने के अधिकार से उपजे विवाद और उसकी मौत के नाम.

पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने एक लेख में जिक्र किया है, “जनादेश देश का है और जनादेश किसी को गुलाम नहीं बनाता। और आजादी जब छिनती नहीं और बोल कि लब आजाद है तेरे, बोल जुबां अब तक तेरी है, बोल कि सच जिंदा है अब तक, बोल कि जो कहना है कह ले…।”

सत्ता से लड़ने वाले के चेहरे पर जब चमक आ जाती है तो फैज को याद करना क्या बुरा है…तो

लोकतंत्र की ताकत और लिखने-बोलने की स्वतंत्रता की कीमत भी पुण्य प्रसून वाजपेयी और एबीपी न्यूज के दो अन्य एंकरों को चुकानी पड़ी। यह मुद्दा लोकसभा में शुक्रवार को कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने उठाते हुए आरोप लगाया कि पीएम मोदी की आलोचना करने की वजह से एबीपी न्यूज के एडिटर मिलिंद खांडेकर और एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ एक एंकर को कथित तौर पर हटा दिया गया है। ये प्रेस पर सेंसरशिप है। इस पर सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने कांग्रेस के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उस चैनल की टीआरपी गिर रही थी। बहरहाल, चर्चा तो है, क्योंकि 6 जुलाई को एबीपी न्यूज पर पुण्य प्रसून वाजपेयी के कार्यक्रम ‛मास्टर स्ट्रोक’ में 20 जून के पीएम के कार्यक्रम में किये गए दावों की जमीनी हकीकत कुछ और दिखी। मीडिया रिपोर्ट और सूत्रों के मुताबिक उसके बाद से कई मंत्री इस कार्यक्रम से नाराज चल रहे थे। ‛मास्टर स्ट्रोक’ के दौरान कुछ दिन टीवी पर ‛ब्लैकआउट’ की भी स्थिति रही। वाजपेयी ने खुद पिछले महीने इस ‘ब्लैकआउट’ की आलोचना करते हुए लिखा था, ‘आप ‘मास्टरस्ट्रोक’ की स्क्रीन को ब्लैक करोगे.. हम उसे ‘ब्लैक बोर्ड’ मान कर सच लिख देगें…’। बातें कई और भी हैं, लेकिन, ‛बंद मुठ्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की’ सो सिर्फ इतना बुधवार 1 अगस्त को चैनल प्रबंधन ने एडिटर इन चीफ मिलिंद खांडेकर के इस्तीफे की घोषणा की। इसके बाद हाल ही में एबीपी पहुंचे, चर्चित शो ‘मास्टर स्ट्रोक’ के एंकर और पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के चैनल छोड़ने की खबर आई। इन दोनों के अलावा चैनल के सीनियर न्यूज एंकर अभिसार शर्मा को 15 दिन के लिए ‘ऑफ एयर’ रहने (चैनल पर न आने) के लिए कहा गया है। मीडिया और राजनीतिक हलकों में इसे किसी मीडिया हाउस के सत्तारूढ़ दल को खुश रखने की कोशिश की तरह देखा जा रहा है।

सरकार कुछ नहीं जानती!
केंद्र सरकार जनता के सरोकार से जुड़े कई मुद्दों पर यह जवाब दे चुकी है और जाहिर है कि इस मामले में भी यही स्थिति है।


गंगा सफाई पर 3,800 करोड़ स्वाहा, पर…
एक आरटीआई अर्जी के जवाब से खुलासा हुआ कि सरकार गंगा की सफाई पर अब तक 3,800 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर सफाई कहां-कहां हुई? इतनी बड़ी रकम कहां-कहां और किन मदों में खर्च हुई? इस बारे में सरकार नहीं जानती! समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक आरटीआई याचिकाकर्ता एवं पर्यावरणविद् विक्रम तोगड़ कहते हैं, आरटीआई के तहत यह ब्योरा मांगा गया था कि अब तक गंगा की कितनी सफाई हुई है, लेकिन सरकार इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं करा पाई। सरकार सिर्फ दावा करती है, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि मार्च 2019 तक गंगा की साफ हो जाएंगी, जबकि हाल ही में
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण, एनजीटी ने गंगा की सफाई को लेकर बहुत सख्त टिप्पणी की है। एनजीटी के प्रमुख जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने कहा है कि गंगा की सफाई के लिए एक ठोस कदम नहीं उठाया गया है। उन्होंने उत्तराखंड सरकार की ओर से दायर कार्रवाई रिपोर्ट को खारिज कर दिया और कहा कि कागजों में जो कहा जाए पर जमीन पर हालात बहुत खराब हैं। भाजपा के सांसद और केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने इस पर सफाई देते हुए कहा है कि यह कहना सही नहीं है कि गंगा परियोजनाओं से कुछ हासिल नहीं हुआ है। ध्यान रहे पिछले दो दशक में गंगा एक्शन प्लान-1, गंगा एक्शन प्लान-2, गंगा नदी घाटी परियोजना और नमामि गंगे जैसी योजनाएं चली हैं, जिन पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। और इनका कुल जमा हासिल वह है जो मंत्री ने बताया है। जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखता है। इन सबमें गौर करने की बात यह भी है कि
गंगा जहां से निकलती है और जहां तक पहुंचती है उस रास्ते में लगभग हर जगह भाजपा की सरकार है। गंगा जहां समुद्र में मिलती हैं सिर्फ वहीं तृणमूल कांग्रेस की सरकार है।

बेरोजगारी पर सरकार मौन


देश में बेरोजगारी की समस्या दिन ब दिन भयावह होती जा रही है। यह समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है इसका अंदाजा सरकार तक को नहीं है, क्योंकि उसके पास बेरोजगारी के आंकड़े ही नहीं हैं। बीते एक साल से देश के बेरोजगार लोग नौकरी पाने के लिए लगातार धरने-प्रदर्शन करते नजर आ रहे हैं। खासकर सरकारी नौकरियों में भर्तियों की प्रक्रिया को लेकर युवाओं का असंतोष सड़कों पर दिखने लगा है। मराठा आंदोलन के रूप में पूरा महाराष्ट्र जल रहा है, मगर सरकार को बेरोजगारी नहीं दिखती। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष कुमार गंगवार ने हाल ही में संसद में रोजगार के आकंड़ों को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि, भारत सरकार ने साल 2016 से देश में रोजगार के वास्तविक आंकड़ों को जानने के लिए कोई भी देशव्यापी सर्वे नहीं कराया है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार 2014 में देश में बेरोजगारी की दर 3.41 फीसदी थी, जो अगले तीन सालों (2015, 2016 और 2017) में बढ़ते हुए 3.49, 3.51 और 3.52 फीसदी हो गई। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली निजी एजेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआईई) के बेरोजगारी संबंधी आंकड़े आईएलओ से करीब एक फीसदी ज्यादा हैं। सीएमआईई यह भी कहती है कि अप्रैल 2018 में देश में 5.86 फीसदी बेरोजगारी थी। हालांकि, केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार जिन वादों के सहारे आई उनमें रोजगार मुख्य था। एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए 22 नवंबर, 2013 को नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि यदि भाजपा की सरकार बनी तो हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि देश की आबादी में 35 साल से कम के 65 फीसदी लोग हैं, लेकिन कांग्रेस की सरकार युवाशक्ति का राष्ट्रनिर्माण में उपयोग करने में नाकाम रही है। अब सरकार बेरोजगारी के आंकड़े जुटाने से भी परहेज कर रही है!

भीड़तंत्र का शिकार लोगों का आंकड़ा नहीं


पिछले कुछ समय से भीड़तंत्र द्वारा हत्या का मुद्दा पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कई दफा अपनी आपत्ति दर्ज करा चुका है। लेकिन, आश्चर्य किंतु सत्य कि अब तक भीड़ की पिटाई से कितनी मौतें हुईं, इसके आंकड़े सरकारी एजेंसियों के पास नहीं हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का कहना है कि 2017 के आंकड़े जब जारी किए जाएंगे, उनमें मॉब लिंचिंग की घटनाओं का जिक्र रहेगा।
12 राज्यों में 2000 से लेकर 2012 के बीच डायन बताकर भीड़ ने 2097 हत्याएं कीं। 2011 जनवरी से 2017 जून के बीच मॉब लिंचिंग की घटनाएं 20% बढ़ गईं। 2017 के पहले छह महीनों के दौरान 20 हमले गौहत्या की अफवाह पर हुए। ये 2016 से 75% ज्यादा थे। देश के 10 राज्यों में 2018 में भीड़ की पिटाई में मौत के 14 केस दर्ज हुए हैं। इनमें 31 लोगों की मौत हुई। 14 में से 11 केस में अफवाह बच्चा चोरी की थी। 2002 में पहला बड़ा मामला सामने आया, जब हरियाणा में गौहत्या की अफवाह के चलते भीड़ ने पांच दलितों को पीट-पीटकर मार डाला। यही अफवाह मुजफ्फरनगर और कोकराझार में दंगों का कारण बनी। इंडिया स्पेंड वेबसाइट के मुताबिक 2010 से 2017 के बीच दर्ज 63 केस में से 97% पिछले तीन साल में दर्ज हुए। 63 में से 61 केस गौरक्षक दल बनाने और गौमांस पर रोक लगाने के बाद दर्ज हुए। हालांकि, ऐसे आंकड़ों का कोई ऑफिशियल रिकॉर्ड अब तक नहीं है। एनसीआरबी का कहना है कि क्राइम इन इंडिया 2017 पब्लिकेशन में वह पहली बार ऐसे आंकड़ों को शामिल करेगा।

और जाने कितने वादे-दावें हैं, जिन्हें लेकर राजनीति की जाती है, सरकारें बनतीं हैं, गिरती हैं। चाहे बीजेपी के एक वरिष्ठ विधायक और पूर्व केंद्रीय मंत्री बसवनगौड़ा पाटिल यतनाल ने यह तक कह दिया हो, “अगर मैं गृहमंत्री होता तो पुलिस को आदेश दे देता कि वे बुद्धिजीवियों को गोली मार दें।”
लेकिन सच यह है कि हर दौर में लिखने-बोलने का काम होता रहा है और आगे भी जारी रहेगा, क्योंकि यह लोकतंत्र है, जिसके मंदिर संसद की चौखट पर माथा टेक कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के हर तबके को जीने का समान अधिकार देने का सपना दिखाया था।
■ सोनी सिंह

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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