पिया मेंहंदी मंगा द मोतीझील से, जाइके सायकिल से ना…

लोकगीत कजरी पर विशेष लेख…

सावन का जिक्र होते ही दिलोदिमाग़ में आसमान से झरती रिमझिम फुहारें, फिज़ा से बहती मंद-मंद शीतल हवाएं और नीम के पेड़ की डाली से लटकते झूले पर झूलती हुई गांव की गोरियां और उनके मधुर स्वरों में गूंजती कजरी जीवंत हो जाती है। सावन के हरियाली भरे महीने में गांव में होने का अपना अलग मज़ा होता है। सावन है तो कजरी है, क्योंकि पूर्वांचल उत्तर प्रदेश में सदियों से कजरी और सावन का चोलीदामन का संबंध रहा है। कजरी का लोक संस्कृति और परंपराओं से अटूट नाता है

दिल को छू लेने वाली कजरी वैसे तो संपूर्ण पूर्वांचल उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा प्रचलित और लोकप्रिय है, लेकिन मिर्ज़ापुर, बनारस, जौनपुर और गोरखपुर के आसपास इसकी कई विशिष्ट शैलियां विकसित हुईं जो गांवों में आज भी देखने को मिलती हैं। कजरी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें गांव का अद्भुत चित्रण होता है। गांव से जुड़ी छोटी-छोटी बातों और परंपराओं को कजरी में बड़े मार्मिक ढंग से पिरोया जाता है। इसीलिए जब भी हम कजरी सुनते हैं तो ख़ुद-ब-ख़ुद ख़यालों में खो जाते हैं। कजरी सुनते हुए धीरे-धीरे ऐसा लगने लगता है, हम फिर से अपना अतीत जी रहे हैं। यह सुखद एहसास बस कजरी ही देती है।

प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मिर्ज़ापुर मां विंध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केंद्र रहा है। प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। आज की कजरी के विषय विस्तृत हैं, परंतु कजरी गायन का प्रारंभ देवी गीत से ही होता है। एक पुरानी लोकोक्ति ‘लीला राम नगर कै भारी कजरी मिर्जापुर सरनाम’ कजरी का संबंध मिर्ज़ापुर से जोड़ती है। इसी बिना पर कहा जाता है कि कजरी का उद्भव मिर्ज़ापुर ही हुआ। कजरी की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद नहीं है फिर भी इस बात पर सभी एकमत हैं कि कजरी का चलन मिर्ज़ापुर से ही आगे बढ़ा। कजरी से जुड़े लोगों का मानना है कि कजरी का मायका मिर्ज़ापुर और ससुराल बनारस है। हालांकि दोनों की कजरी में शैली का अंतर है। परंतु इन दोनों जिलों में कजरी को काफी बढ़ावा मिला। बनारस के संगीतकारों ने लोकगीतों की तरह कजरी को भी शास्त्रीय सुरों में ढालकर उपशास्त्रीय गायन की एक नई विधा विकसित की जो काफी लोकप्रिय हुई। कजरी अर्ध-शास्त्रीय गायन की विधा के रूप में भी प्रचलित हुई। इसके गायन में बनारस घराने का ख़ास दखल रहा है।

कई लोग कजरी परंपरा शुरू करने का श्रेय मध्य भारत के राजा दानो राय को देते हैं। दानो राय ने कज्जला देवी यानी विंध्याचल देवी की स्तुति के रूप में कजरी परंपरा की नींव रखी थी। एक अन्य प्रचलित मान्यता के अनुसार दानो राय की मौत के बाद उनकी रानी समेत महिलाओं ने अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए जिस नए गीत की रचना की, उसे ही कजरी कहते हैं। तीसरी मान्यता के अनुसार कांतित के राजा की लड़की का नाम कजरी था, जो अपने पति से बहुत प्यार करती थी। वह पति से अलग कर दी गई। पति की याद में उसने जिस प्रेमगीत को गाया, उसे ही कजरी कहते हैं। इसीलिए मिर्ज़ापुर के लोग कजरी को कजरी के नाम से भी याद करते हैं और कजरी महोत्सव मनाते हैं।

बदलते समय के साथ लोक संगीत के दूसरे प्रारूपों में काफी बदलाव आए, लेकिन कजरी जस की तस रही। तेरहवीं शताब्दी के बड़े सूफी शायर अमीर ख़ुसरो की बहुप्रचलित कजरी ‘अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया।’ से यही लगता है कि कजरी परंपरा भारत की सदियों पुरानी परंपरा है। इतना ही नहीं, अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की कजरी ‘झूला किन डारो रे अमरैया’ भी बेहद प्रचलित है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ब्रज और भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरी गीतों की रचना की।

कजरी गायन की बात करें, तो लगभग सभी शास्त्रीय गायकों और वादकों ने कजरी की पीड़ा को सुर दिए हैं। गिरिजादेवी की आवाज़ और बिस्मिल्लाह खां की शहनाई में कजरी की वेदना शिद्दत से महसूस की जा सकती है। पंडित छन्नूलाल मिश्र, शोभा गुर्टू, सिद्धेश्वरी देवी, शारदा सिन्हा और विंध्यवासिनी देवी जैसे नामचीन लोगों ने कजरी गायन में अपना स्वर या सुर देकर अहम योगदान दिया। इनके गाए कजरी गीत हमारी अनमोल धरोहर हैं। सिनेमा में भी कजरी का खूब प्रयोग हुआ, लेकिन ज्यादातर कजरी में उसकी आत्मा नज़र नहीं आती है। फिल्म ‘बंदिनी’ में कालजयी संगीतकार सचिनदेव वर्मन के संगीत में गीतकार शैलेंद्र की लिखी कजरी आज भी सिनेमा में कजरी गीतों का मील का पत्थर है।

रचना विधान की दृष्टि से कजरी का नाम ‘चौलर’ या चौलीर है। चौलीर में पांच फूल और चार बंदिशें होती हैं, पांचवें फूल पर कजरी समाप्त हो जाती है। यह कजरी बिना वाद्य यंत्रों के भी गाई जा सकती है। कजरी का दूसरा भेद है शायरी। यह भेद अपेक्षाकृत नया है। इसमें बंदिशों की संख्या निश्चित नहीं होती। इसे प्राय: पुरुष गाते हैं। गायक की आवाज तेज हो और साथ में ढोल-नगाड़े की थाप हो तभी इस कजरी की रंगत जमती है।

दरअसल, मुंबई के लोग कोरोना संक्रमण के चलते भले अपने-अपने घरों में क़ैद है, लेकिन वैसे भी कंक्रीट के जंगल में मशीन जैसा जीवन ही तो जीते रहे हैं। इस यंत्रवत और आर्टिफ़िशियल लाइफ़ में जीवन तो होता ही नहीं है। इस जीवन में न लोग ख़ुद मौजूद हैं, न ही उनकी परंपराएं। सच कहें तो इस तरह के तनाव भरे जीवन को जीते-जीते लोग, वास्तविक जीवन को जीना ही भूल गए हैं। जो जी रहे हैं, उसे तो जीवन कहा ही नहीं जा सकता है। कहने का मतलब लोग पैसे से हर सुख-सुविधाएं जुटा तो लेते हैं, किंतु इस चक्कर में अपने नैसर्गिक जीवन से बहुत दूर हो जाते हैं। जीने का यह नीरस सिलसिला कभी ख़त्म ही नहीं होता।

कभी-कभी ऐसे तनाव भरे माहौल में ख़ासकर बारिश की रिमझिम के बीच लोगों को अपने गांव की गलियों, चकरोटों और कच्चे रास्तों पर ले जाती है कजरी। कजरी सुनकर अचानक याद आता है, अरे, हम कभी बचपन में गांव में होते थे, जहां सावन महीना शुरू होते ही गांवों में कजरी और झूलों की धूम मच जाती थी। कजरी सुनते-सुनते याद आता है, शाम को दोस्तों के साथ खलिहान में खेल और धमाचौकड़ी। आहीपाही का खेल, चकरोच और पगडंडियों में बेतहाशा भागना, सुबह उठकर गाय-भैस का सानी-पानी करना, थन का ताजा दूध पीना, पेड़ों पर चढ़कर दातून तोड़ना, डाकिए का इंतज़ार करना, जो हमारे प्रियजनों की चिट्ठियां लाता था। इतना ही नहीं कजरी सुनते-सुनते है, हम एक बिछड़न सा महसूस करने लगते हैं, कि पड़ोस की भाभी जिनके पति परदेस में रहते थे, कितने दर्द भरे गीत गाती थीं। इतना ही नहीं कजरी सुनते-सुनते हम देखते हैं कि इस खूबसूरत गीत में इंसानों ही नहीं, बल्कि प्रकृति और वन्य जीवों का भी जिक्र होता है। पक्षियों का कलरव, नदी-नाले और झरने का वर्णन होता है। सावन में पेड़-पौधे की हरियाली और उनकी घनी छांव कजरी में समाहित रहती है।

कहा जाता है कि कभी कजरी के चार अखाड़े हुआ करते थे, जिन्हें प. शिवदास मालवीय अखाड़ा, जहांगीर अखाड़ा, बैरागी अखाड़ा और अक्खड़ अखाड़ा कहा जाता था। इन अखाड़ों के बीच मुक़ाबला बनारस, बलिया, चंदौली और जौनपुर जिले में होता था। कजरी का आरंभ ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा से होता है। तीन मास तेरह दिन कजरी गाने का विधान है। गंगा दशहरा से आरंभ होनेवाली यह गायन परंपरा नागपंचमी से लेकर कजरी तीज तक चरमोत्कर्ष पर रहती है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया को कजरी-तीज त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर सुहागिनें कजरी खेलने अपने माइके जाती हैं। शादी के बाद पहले सावन में लड़कियां अपने माइके में ही होती हैं। युवतियां ताल, तालाब या नदी से मिट्टी लाकर उसका पिंड बनाती हैं और उसमें जौ के दाने गड़ा देती हैं। इस पिंड को रोज़ाना स्नान करके पानी देती हैं। पानी डालने से जौ के पौधे निकल आते हैं। इन पौधों को कजरी वाले दिन लड़कियां अपने भाई तथा बुजुर्गों के कान पर रखकर उनसे आशीर्वाद या भेंट प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया को ‘जरई खोंसना’ कहते हैं।

इसके एक दिन पूर्व यानि भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया को ‘रतजगा’ का त्योहार होता है। इस अवसर पर रात भर उत्सव का माहौल होता है। तीज के दिन महिलाएं झूला डालती हैं। महिलाएं रात भर कजरी गाती हैं। समूह में गाए जाने वाली कजरी को धुनमुनिया कजरी कहते हैं। धुनमुनिया गांवों की कजरी की एक विशिष्ट शैली है, जिसमें महिलाएं दो समूहों में एक दूसरे का हाथ पकड़ कर गोल घेरे में आगे-पीछे आ-जाकर और झुककर गाती हैं। सजी धजी महिलाएं सावन का आनंद लेती हैं। इसीलिए भारतीय परंपरा में सावन आने का मतलब सुहागनों के सजने संवरने के दिन से होता है। हाथों में हरी चूड़ियों और मेहंदी के साथ वे सावन मनाती हैं। श्रद्धा उमंग और खुमारी के संगम से शुरू होने वाले इस महीने का चरम हरियाली तीज पर पहुंचकर समाप्त होता था। रतजगा में गायन के साथ हास-परिहास, नकल, जोगीरा और प्रात: स्नान से पूर्व पतियों का नाम लेकर गाने की परंपरा भी है।

कजरी में वर्षा ऋतु का वर्णन विरह-वर्णन और राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन अधिकतर मिलता है। इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। “घिर-घिर आई बदरिया, सजन घर नाही रे रामा… बार-बार राह देखइ नजरिया, सजन घर नहीं रे रामा…” इस खूबसूरत कजरी में नायिका जिसका पति परदेस में है, अपने प्रियतम की कमी को मिस कर रही है। मसलन बादल घिर आए हैं, और रिमझिम रिमझिम बारिश भी हो रही है, मगर ऐसे ख़ुशनुमा मौसम में मेरे प्रियतम मेरे पास नहीं हैं, वह मुझसे सैकड़ों कोस दूर हैं। इसी तरह “हरे रामा नाचत मुरैला बाग देखन हम जाबै रे हरी!” कजरी में नायिका बगीचे में जाने का आग्रह करती है ताकि वह मोर का नृत्य देख सके।

कजरी लोकगायन की वह शैली है जिसमें परदेस कमाने गए पुरुषों की अकेली रह गईं स्त्रियां अपनी विरह-वेदना और अकेलेपन का दर्द व्यक्त करती हैं। इसी तरह की अभिव्यक्ति “सइयां बिना ना भावे सवनवां…” कजरी में होती है। नवविवाहिताएं कजरी के माध्यम से मायके में छूट गए रिश्तों की उपेक्षा की वेदना प्रकट करती हैं। विंध्य क्षेत्र में गाई जाने वाली कजरी में सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की मिठास और खटास के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है।

“मिर्जापुर कइलन गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कइले बलमू, एही मिर्जापुर से उडले जहजवा, सैंया चल गइल रंगून हो, कचौड़ी गली सून कइले बलमू…” मिर्ज़ापुर शैली में गाई जाने वाली कजरी की खासियत उसकी मिठास है। इसमें कभी प्रेमी-प्रेमिकाओं की संवेदनाओं, पति-पत्नी की आत्मीयता और ननद-भौजाई का चुहल भरे संबंधों का खूबसूरत तानाबाना दिखता है तो कभी सहेलियों की झूलों पर हंसी ठिठोली का भी दीदार होता है। इसी तरह का भाव “पिया सड़िया लिया द मिर्जापुरी पिया, रंग रहे कपूरी पिया ना.. जबसे साड़ी न लिअइबा, तबसे जेवना न बनइबे, तोरे जेवना पे लगिहै मजूरी पिया, रंग रहे कपूरी पिया ना… ” के जरिए व्यक्त किया गया है।

वैसे कजरी का सीधा संबंध प्रेम से है। कजरी अकसर करुण रस यानी विरह की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। “नाहीं आए मोरे सजनवां, बितल जाए सवनवां ना…” कजरी में विरह की अभिव्यक्ति होती है। विरह के बाद संयोग की अनुभूति से बेकरारी भी बढ़ा देती है और प्रिया अपने प्रियतम से इतराते हुए फरमाइश करने लगती है। यहां कजरी प्रेम रस में बदल जाती है और इतना सराबोर करती है कि तन मन प्रेम से भीग जाता है। “पिया मेंहंदी मंगा द मोतीझील से, जाइके सायकिल से ना। पिया मेंहदी लिअइह, छोटकी ननदी से पिसइह, अपने हाथ से लगाय दा कांटा-कील से जायके साइकिल से ना।”

वैसे लोकगीतों में कजरी सिर्फ गायिकी का अंदाज नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति के सौंदर्य को सहेजने का एक संदेश भी रहता है। कह सकते हैं कि कजरी पर्यावरण को गीत-संगीत के ज़रिए इंसान से जोड़ने का अभिनव और अद्भुत माध्यम है। कजरी केवल श्रृंगार रस या प्रेम रस का गीत नहीं है। इसमें देशभक्ति, लोकचिंतन, परंपराचिंतन और प्रकृति प्रेम भी सुनने को मिलता है। परंतु आधुनिकरण के दौर में गांवों के भी शहर में तब्दील होने की प्रक्रिया के चलते गांवों से भी यह गौरवशाली परंपरा विलुप्त सी हो रही है। मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक और वाट्सअप के दौर में गांव की ढेर सारी बातें हमारी सोच से विस्मृत होती जा रही हैं। बदलते परिवेश में सावन में गांवों में सुनाई देने वाले इन सदाबहार लोकगीतों के बोल धीरे धीरे गांव में ही मंद पड़ने लगे हैं। लोकसंगीत एवं लोकसंस्कृति के प्रमुख अंग के रूप में कजरी भी लुप्त होने के कगार पर है। इस लोक संस्कृति की रक्षा इससे जुड़ कर ही की जा सकती है।
अतिथि लेखक : हरिगोविंद विश्वकर्मा

Post Author: kashipatrika

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