प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया

प्रार्थना जितनी गहरी होगी उतनी निःशब्द होगी। कहना चाहोगे बहुत, पर कह न पाओगे। प्रार्थना ऐसी विवशता है, ऐसी असहाय अवस्था है। शब्द भी नहीं बनते। आंसू झर सकते हैं। आंसू शायद कह पाएं…

किसी ने प्रश्न किया, “मैं प्रार्थना में बैठता हूं तो बस चुप रह जाता हूं!” यही सच है, क्योंकि परमात्मा से तो केवल एक ही नाता बन सकता है हमारा, एक ही सेतु-वह है, चुप्पी का। परमात्मा और कोई भाषा जानता नहीं, पर शब्दों पर हमारा बड़ा भरोसा है। उन्हीं के सहारे हम जीते हैं। हमारा सारा जीवन भाषा है। इसी लिए तुम पूछते हो, क्या यही प्रार्थना है? मैं तुम्हारी अड़चन समझता हूं। तुम सोचते होओगे गायत्री मंत्र, नमोकार, कुरान क्या पढ़कर प्रभु की स्तुति करूं। कुछ प्रशंसा करूं, परमात्मा की। कुछ निवेदन करूं हृदय का। और नहीं कर पाते हो निवेदन; जैसे जबान पर जंजीर पड़ गयी, जैसे ओंठ किसी ने सी दिए। तो चिंता उठती है, यह कैसी प्रार्थना! न बोले न चाले, तो उस तक आवाज कैसे पहुंचेगी? उस तक आवाज पहुंचाने की जरूरत ही नहीं है।

दूलनदास ने कहा परमात्मा बहरा नहीं है! तुम चिल्लाओ इसकी कोई जरूरत नहीं है।

एक मंद आभास मात्र से मन सरवर का जल लहराया,

तुमको ही आराध्य मानकर तेरे तट से जा टकराया।

लेकिन कुछ ऐसा लगता है शायद तुमको पा न सकूंगा,

इतनी दूर पा रहा तुमको उड़कर भी मैं आ न सकूंगा।

कहते सभी कठिन होता है,

जग में नहीं मिलन होता है,

महामिलन को मृत्यु दान कर,

एक बार बस गले लगाओ,

फिर न कहूंगा,

सच कहता हूं।

जाने क्या हो गया हृदय को सब कुछ तेरा ही लगता है,

बिना तुम्हें पाए यह जीवन व्यर्थ और सूना लगता है।

ऐसी मन की व्याकुलता है तेरे बिन अब रहा न जाता,

तुमको सुधियों में पाकर दर्द विरह का सहा न जाता।

ओ, मेरी सुधियों के वासी,

प्रेम स्वरूप अमर अविनाशी,

कर स्वीकार साधना मेरी,

एक बार मुझको अपना लो,

फिर न कहूंगा,

सच कहता हूं।

मगर यह सिर्फ भाव हो, शब्द न बने। यह तुम्हारे भीतर घनी प्रतीति हो। शब्द तो सब चीजों को छिछला कर जाते हैं।

■ सौजन्य: ओशो गंगा

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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