“सब कुछ शुभ है”

हर चीज वैसी ही है जैसी होनी चाहिए, यानी हमारे चारों ओर जो कुछ भी है सब शुभ है, सब सुंदर है। सब कुछ गहनतम लयबद्धता में है, यहीं जान लेना, बुद्धत्व है…

बुद्धत्व और कुछ नहीं बस इतना ही है कि हर चीज वैसी ही है जैसी कि होनी चाहिए, हर चीज पूरी तरह से पूर्ण है जैसी है। यह अहसास…और अचानक तुम घर पर होते हो। कुछ भी बाकी नहीं बचता। तुम हिस्से हो, एक जैविक हिस्से हो इस महानतम, सुंदर पूर्ण के। तुम इसमें विश्रांत हो, इसमें समर्पित। तुम अलग से नहीं बचते-सभी विभाजन विदा हो जाते हैं।

एक महा आनंद घटता है, क्योंकि अहंकार के विदा होते ही कोई चिंता नहीं बचती, अहंकार के विदा होने के साथ ही किसी तरह की पीड़ा नहीं बचती, अहंकार के विदा हो जाने के साथ ही किसी तरह की मृत्यु की संभावना नहीं बचती। यह बुद्धत्व है। यह समझ है कि सब कुछ शुभ है कि सब सुंदर है–और यह जैसा है वैसा ही सुंदर है। सब कुछ गहनतम लयबद्धता में है, तालमेल में है।

■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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