प्रेम डोर मत बांध

प्रेम किसी तरह का बंधन निर्मित नहीं करता। और यह प्रेम केवल, तुम्हारे ह्रदय के द्वार का खुलना है- सब हवाओं के लिए, पूरे आकाश के लिए…

संबंध एक ढांचा है, जबकि प्रेम का कोई ढांचा नहीं है। इसी लिए प्रेम सम्बंधित तो अवश्य होता है, पर कभी संबंध नहीं बनता। प्रेम एक क्षण-से-क्षण की प्रक्रिया है। स्मरण रखें। प्रेम तुम्हारे होने कि स्थिति है, वह कोई संबंध नहीं। ऐसे लोग हैं जो प्रेम करते हैं और ऐसे भी जो प्रेम नहीं करते। जो लोग प्रेम नहीं करते वे संबंधों के माध्यम से प्रेममय होने का नाटक करते हैं। प्रेम करने वाले लोगों को संबंध बनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती-प्रेम पर्याप्त है।
इसी लिए कहता हूं एक प्रेम संबंध में पड़ने के बजाय तुम एक प्रेम करने वाले व्यक्ति बनो, क्योंकि संबंध एक दिन बनते हैं और अगले ही दिन मिट जाते हैं। वे फूलों के सामान हैं; सुबह खिलते हैं, और श्याम ढलते ही विदा हो जाते हैं। परन्तु लोगों को प्रेममय व्यक्ति बनने में बहुत कठिनाई होती है, तो वे एक संबंध खड़ा कर लेते हैं। और इस तरह से बेफकूफ बनाते है “मैं एक संबंध में हूं, इसलिए मैं अब एक प्रेममय व्यक्ति हूं।” हो सकता है यह संबंध बस किसी डर से बनाया गया हो, जिसका प्रेम से कुछ लेना-देना न हो। मात्र एक सुरक्षा हो-आर्थिक या कोई और।
यह प्रेम किसी तरह का बंधन निर्मित नहीं करता। और यह प्रेम केवल, तुम्हारे ह्रदय के द्वार का खुलना है- सब हवाओं के लिए, पूरे आकाश के लिए। यह थोड़ा विचित्र दिखता है; परन्तु हमें हमेशा यह सिखाया गया है कि प्रेम एक संबंध है, तो हम इस सोच के आदि हो गए हैं कि प्रेम बस एक संबंध है। परन्तु यह सत्य नहीं है। यह निम्नतम प्रकार का प्रेम है- बहुत प्रदूषित।
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *