मन उजियारा, जग उजियारा

मैं धर्म की जगह धार्मिकता की बात करता हूं। क्योंकि धर्म से अर्थ होता हैः बंधी-बंधाई धारणाएं। धर्म से अर्थ होता हैः मान्यताएं, विश्वास। और धार्मिकता से अर्थ होता हैः चैतन्य की उज्ज्वल स्थिति; भीतर का ज्योतिर्मय हो जाना, आलोकित हो जाना…
भीतर अंधेरा है अभी, यह अधर्म। या ज्यादा ठीक होः अधार्मिकता। और भीतर चेतना का प्रकाश फैल जाए, ध्यान जगे, ध्यान की लपट उठे, तो धार्मिकता।
मुल्ला नसरुद्दीन एक वकील के पास गया था। वकील ने उससे पूरा मामला सुना और सुनकर कहा कि बिल्कुल घबड़ाओ मत, हजार रुपया फीस लगेगी लेकिन मुकदमा तुम निश्चित जीतोगे। तुम्हारी जीत सुनिश्चित है। तुम्हारा मामला बिल्कुल साफ है। इसमें हार की कोई संभावना नहीं है। मुल्ला नसरुद्दीन उठकर खड़ा हो गया। वकील ने पूछा, कहां जाते हो? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि जब जीत साफ ही है और हार का कोई उपाय ही नहीं, तो क्या फायदा लड़ने से? वकील ने कहा, मैं कुछ समझा नहीं। तो क्या हारने के लिए लड़ना चाहते हो?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, अब तुम से क्या छिपाना? यह मैंने अपने विरोधी की तरफ से जो मामला है, वह कहा था। जब जीत की बिल्कुल निश्चय ही है और हार हो ही नहीं सकती, तो अब लड़ना क्या? यह मैंने विरोधी की तरफ से जो-जो दलीलें थीं वे तुम्हारे सामने रखीं। और तुम कहते हो जीत बिल्कुल सुनिश्चित है। सो विरोधी जीतेगा। अब ये हजार रुपए और किसलिए खराब करने। वकील तो सभी को कहता है कि जीतोगे। इसने अगर अपना मामला बताया होता तो भी यही कहता। इसने किसी और का मामला बताया तो भी यही कहा। वकील का तो धंधा यही है।
तर्क का भी धंधा है। ईश्वर को सिद्ध कर सकते हो तर्क से, असिद्ध कर सकते हो। इसी लिए तो नास्तिक और आस्तिक सदियों से उलझते रहे, जूझते रहे, कोई निर्णय न हुआ। मैं धर्म को सिद्धांत की बात नहीं मानता। सिद्धांत तो बदल जाते हैं। नए तथ्य निकल आते हैं, तो सिद्धांतों में रूपांतरण करना होता है। विज्ञान सिद्धांतों की बात है। इसलिए विज्ञान में रोज सिद्धांत बदलते हैं। न्यूटन के समय में एक सिद्धांत था, एडीसन के समय में दूसरा हुआ, आइंस्टीन के समय में तीसरा हुआ, अब आइंस्टीन के भी आगे बात जा रही है। नए तथ्य प्रकट हो रहे हैं। यह रोज बदलाहट होती रहेगी।
धर्म सिद्धांत नहीं है। धर्म फिर क्या है? धर्म ध्यान है, बोध है, बुद्धत्व है, इसलिए मैं धार्मिकता की बात करता हूं। चूंकि धर्म को सिद्धांत समझा गया है, इसलिए ईसाई पैदा हो गए, हिंदू पैदा हो गए, मुसलमान पैदा हो गए। अगर धर्म की जगह धार्मिकता की बात फैले तो फिर ये भेद अपने आप गिर जाएंगे। धार्मिकता कहीं हिंदू होती है कि मुसलमान होती है कि ईसाई होती है! धार्मिकता तो बस धार्मिकता होती है। स्वास्थ्य हिंदू होता है कि मुसलमान कि ईसाई? प्रेम जैन होता है, बौद्ध होता है की सिक्ख? जीवन, अस्तित्व इन संकीर्ण धारणाओं में नहीं बंधता। जीवन सभी संकीर्ण धारणाओं का अतिक्रमण करता है। इनके पार जाता है। धार्मिकता धर्मों के पार है। जिस क्षण तुम अपने भीतर आओगे उसी क्षण पाओगे–वह महत संपदा, जो दबी पड़ी है। जिसकी तुम खोज कर रहे हो, वह तुम्हारे भीतर मौजूद है। बाहर से थको तो कोई क्रांति घट सकती है। बाहर से थको और भीतर आओ–अपने पर आओ। वहीं मुकाम है। वहीं अंतिम पड़ाव है। वहीं विराम है। वहीं विश्राम है।
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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