“कृतज्ञता से भरो”

कभी समुद्र के करीब बैठकर आपने अनुभव किया है कि मेरे भीतर भी समुद्र का एक हिस्सा है। और उसके लिए मुझे समुद्र का कृतज्ञ होना चाहिए। जो सूरज की रोशनी मेरे भीतर है, उसके प्रति मुझे कृतज्ञ होना चाहिए। और हवाएं मेरे प्राण को चलाती हैं, उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए…

कृतज्ञता बहुत डिवाइन, बहुत दिव्य बात है। हमारी सदी में अगर कुछ खो गया है, तो कृतज्ञता खो गई है, ग्रेटीटयूड खो गया है। आपको पता है, आप जो श्वास ले रहे हैं, वह आप नहीं ले रहे हैं। क्योंकि श्वास जिस क्षण नहीं आएगी, आप उसे नहीं ले सकेंगे। आपको पता है, आप पैदा हुए हैं? आप पैदा नहीं हुए हैं। आपका कोई सचेतन हाथ नहीं है, कोई निर्णय नहीं है। आपको पता है, यह जो छोटी-सी देह आपको मिली है, यह बड़ी अदभुत है। यह सबसे बड़ा मिरेकल है इस जमीन पर। आप थोड़ा-सा खाना खाते हैं, आपका यह छोटा-सा पेट उसे पचा देता है। यह बड़ा मिरेकल है।
अभी इतना वैज्ञानिक विकास हुआ है, अगर हम बहुत बड़े कारखाने खड़े करें और हजारों विशेषज्ञ लगाएं, तो भी एक रोटी को पचाकर खून बना देना मुश्किल है। एक रोटी को पचाकर खून बना देना मुश्किल है। यह शरीर आपका एक मिरेकल कर रहा है चौबीस घंटे। यह छोटा-सा शरीर, थोड़ी-सी हड्डियां, थोड़ा-सा मांस। वैज्ञानिक कहते हैं, मुश्किल से चार रुपए, पांच रुपए का सामान है इस शरीर में। इसमें कुछ ज्यादा मूल्य की चीजें नहीं हैं। इतना बड़ा चमत्कार चौबीस घंटे साथ है, उसके प्रति कृतज्ञता नहीं है, ग्रेटीटयूड नहीं है!
कभी आपने अपने शरीर के प्रति कृतज्ञता का, प्रेम का अनुभव किया है? क्या कभी ख्याल आया कि यह अदभुत बात है! शरीर बड़ा चमत्कार है। और शरीर अदभुत सहयोगी है। इसके प्रति कृतज्ञ हों। इस शरीर में क्या है? जो इस शरीर में है, वह इन पंचमहाभूतों से मिला है। इस शरीर के प्रति कृतज्ञ हों, इन पंचमहाभूतों के प्रति कृतज्ञ हों।
एक दिन सूरज बुझ जाएगा, तो आप कहां होंगे! वैज्ञानिक कहते हैं, चार हजार वर्षों में सूरज बुझ जाएगा। वह काफी रोशनी दे चुका है, वह खाली होता जाएगा। और एक दिन आएगा कि वह बुझ जाएगा। अभी हम रोज इसी खयाल में हैं कि रोज सूरज ऊगेगा। एक दिन वक्त आएगा कि लोग सांझ को इस खयाल से सोएंगे कि कल सुबह सूरज ऊगेगा, और वह नहीं ऊगेगा। और फिर क्या होगा?
सूरज ही नहीं बुझेगा, सारा प्राण बुझ जाएगा, क्योंकि प्राण उससे उपलब्ध है। क्योंकि सारी ऊष्मा और सारा उत्ताप उससे उपलब्ध है।
समुद्र के किनारे बैठते हैं। कभी खयाल किया, आपके शरीर में सत्तर परसेंट समुद्र है, पानी है! और मनुष्य का जन्म इस जमीन पर, कीटाणु का जो पहला जन्म हुआ, वह समुद्र में हुआ था। और आप यह भी जानकर हैरान होंगे, आपके शरीर में भी नमक और पानी में वही अनुपात है, जो समुद्र में है-अभी भी। और उस अनुपात से जब भी शरीर इधर-उधर हो जाएगा, बीमार हो जाएगा।
कभी समुद्र के करीब बैठकर आपने अनुभव किया है कि मेरे भीतर भी समुद्र का एक हिस्सा है। और मेरे भीतर जो हिस्सा है समुद्र का, उसके लिए मुझे समुद्र का कृतज्ञ होना चाहिए। और सूरज की रोशनी मेरे भीतर है, उसके प्रति मुझे कृतज्ञ होना चाहिए। और हवाएं मेरे प्राण को चलाती हैं, उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। और आकाश और पृथ्वी, वे मुझे बनाते हैं, उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।
इस ग्रेटीटयूड को मैं दिव्य कहता हूं। इस कृतज्ञता के बिना कोई आदमी धार्मिक नहीं हो सकता। अकृतज्ञ मनुष्य क्या धार्मिक होंगे! इस कृतज्ञता को अनुभव करें निरंतर और आप हैरान हो जाएंगे, यह आपको इतनी शांति से भर देगी कृतज्ञता और इतने रहस्य से! और तब आपको एक बात का पता चलेगा कि मेरी क्या सामर्थ्य थी कि ये सारी चीजें मुझे मिलें! और ये सारी चीजें मुझे मिली हैं। इसके लिए आपके मन में धन्यवाद होगा। इसके प्रति आपके मन में धन्यवाद होगा, जो आपको मिला है, उसके प्रति कृतार्थता का बोध होगा।
तो जीवन में सतत कृतज्ञता का स्मरणपूर्वक व्यवहार करें। आप पाएंगे कि जीवन बहुत अदभुत हो जाएगा।
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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