सत्यम् शिवम् सुंदरम्

एक बार गांधीजी रविन्द्रनाथ के यहां मेहमान थे। संध्या को दोनों घुमने निकले, तभी रविन्द्रनाथ ने कहा- दो क्षण रूको, मैं बाल संवारकर आता हूं। गांधीजी ने कहा-ये क्या बात हुई, बुढ़ापे में बाल संवारना!
लेकिन, रविन्द्रनाथ नहीं माने और भीतर बाल संवारने चले गए। लौटने में उन्हें दस मिनट का वक्त लग गया। इससे गांधीजी थोड़े नाराज हो गए और बोले-मैं समझ नहीं पाया कि घूमने का वक्त निकला जा रहा था और आप बाल संवार रहे थे?
रविन्द्रनाथ के जवाब पर गांधीजी मुस्कुरा दिए, क्योंकि उन्होंने कहाh-जब मैं युवा था, तब बालों को संवारे बिना भी बाहर निकल जाता था, लेकिन बुढ़ापे में अपनी कुरूपता का प्रदर्शन कर दूसरों के दुख का कारण क्यों बनूं? इसी लिए मैं यह नहीं कहता जो बाल संवार रहे हैं, वे बुरा कर रहे हैं। जो आभूषण पहन रहे हैं, वे बुरा कर रहे हैं, लेकिन सच्चे आभूषण भी पहन लें और सुंदरता को पूरा साधे। फिर आप पाएंगे कि सत्य और शुभ भी अपने आप सध जाएंगे।
■ ओशो

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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