तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए

हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं जमाने के लिए,
घर से बाहर की फजा हँसने-हँसाने के लिए।

यूँ लुटाते न फिरो मोतियों वाले मौसम,
ये नगीने तो हैं रातों को सजाने के लिए।

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदाद-ए-सफर*,
हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए।

मेज पर ताश के पत्तों-सी सजी है दुनिया,
कोई खोने के लिए है कोई पाने के लिए।

तुमसे छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था,
तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए।
■ निदा फाजली

*रूदाद-ए-सफर = यात्रा वृतान्त

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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