माँ दुर्गा की पूजा में रामायण पाठ क्यों!

दुं दुर्गायै नम:! रां रामाय नम: ओम नमो नारायणाय।

राम का अर्थ है-रमन्ते योगिनो यस्मिन् स राम:। अर्थात् योगिगण अपने ध्यान में जिन्हें देखते हैं, वे हैं राम। राम का तंत्र में अर्थ है कल्याणकारी अग्नि और प्रकाश। यानी श्रीराम ऋषि-तत्त्व के प्रतीक हैं, जबकि माँ शक्ति-तत्व की प्रतीक। यही कारण है कि दुर्गार्चन और रामार्चन साथ-साथ चलते हैं। दोनों के बीज-मंत्र हैं- दुं दुर्गायै नम:! रां रामाय नम: ओम नमो नारायणाय। नवरात्र के नव दिन दुर्गा सप्तशती और रामचरित मानस का पाठ करने से प्रकृति में विद्यमान संपूर्ण शक्तियों का संतुलन बनता है। क्योंकि दुर्गा-सप्तशती संपूर्ण रूप से तंत्र-ग्रंथ हैं। यह योग और भोग दोनों फलों को देने वाला है। वहीं रामकथा मोक्ष या योग या कैवल्य की ओर ले जाने वाली विद्या है। साथ ही मानव-सभ्यता के विकास-क्रम का भी प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वाह्य कार्यों के निर्वहन के लिए पुरुष को, जबकि गृह की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी स्त्रियों को सौंपी गई है। नवरात्र में जब कलश-स्थापन की जाती है, तो कलश के नीचे मिट्टी पर जौ उगाया जाता है। यह कृषि-कर्म पुरुष और कलश माँ यानी स्त्री का प्रतीक है। यह पूजा का समाजशास्त्रीय संदर्भ है।

रामायण के एक प्रसंग के अनुसार भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण, हनुमान और समस्त वानर सेना द्वारा आश्चिन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिनों तक माता शक्ति की उपासना कर दशमी तिथि को लंका पर आक्रमण किया था। तभी से नवरात्रों में माता दुर्गा की पूजा करने की प्रथा चल आ रही है। नवरात्रि में रामचरित मानस के सरल दोहे, चौपाई और सोरठा अथवा मंत्रों से देवी को प्रसन्न किया जा सकता है-

(1) मनोकामना पूर्ति एवं बाधा निवारण के लिए
कवन सो काज कठिन जग माही।
जो नहीं होइ तात तुम पाहीं।।’

(2) भय के लिए-
रामकथा सुन्दर कर तारी।
संशय बिहग उड़व निहारी।।’

(3) अनजान स्थान पर भय के लिए मंत्र पढ़कर रक्षारेखा खींचे-
‘मामभिरक्षय रघुकुल नायक।
धृतवर चाप रुचिर कर सायक।।’

(4) भगवान राम की शरण प्राप्ति हेतु-
सुनि प्रभु वचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना।।’

(5) विपत्ति नाश के लिए-
राजीव नयन धरें धनु सायक।
भगत बिपति भंजन सुखदायक।।’

(6) रोग तथा उपद्रवों की शांति हेतु-
‘दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहिं ब्यापा।।’

(7) आजीविका प्राप्ति या वृद्धि हेतु-
‘बिस्व भरन पोषन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।’

(8) विद्या प्राप्ति के लिए-
गुरु गृह गए पढ़न रघुराई।
अल्पकाल विद्या सब आई।।’

(9) संपत्ति प्राप्ति के लिए-
‘जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं।
सुख संपत्ति नानाविधि पावहिं।।’

(10) शत्रु नाश के लिए-
बयरू न कर काहू सन कोई।
रामप्रताप विषमता खोई।।’

आवश्यकता के अनुरूप कोई मंत्र लेकर एक माला जपें तथा एक माला का हवन करें। जप के पहले श्री हनुमान चालीसा का पाठ कर लें तो शुभ रहेगा। जब तक कार्य पूरा न हो, तब तक एक माला (तुलसी की) नित्य जपें। यदि सम्पुट में इनका प्रयोग करें तो शीघ्र तथा निश्चित कार्यसिद्धि होगी। नवरात्रि में एक दिन सुंदरकांड अवश्य करें।

आज माँ दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप की पूजा

मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है। यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं। इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है।

ध्यान
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

स्तोत्र पाठ
कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

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Post Author: Soni

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