देवी पूजा में मंत्रों का महत्व

मंत्र मात्र कुछ शब्द नहीं हैं, बल्कि ये तरंग हैं, जिनके उच्चारण मात्र से सकारात्मकता का प्रवाह होने लगता है। “मननात, त्रायते इति मंत्र” अर्थात: मनन करने से जो त्राण करे, रक्षा करे उसे मंत्र कहते है। राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने मंत्र की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है, ‛कलियुग केवल नाम आधारा, सुमिर सुमिर नर पावहि पारा।’ मंत्र के जानकारों के अनुसार भी मनुष्य के भाग्य चक्र या कर्मों से उत्पन्न होने वाले दुखों का निवारण मंत्रो के द्वारा किया जा सकता है।

सांसारिक भोगो की प्राप्ति एवं आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति हेतु भी मंत्र जप बहुत ही प्रभावशाली माना गया है। प्राचीनकाल से ही मंत्र जाप को हमारे ऋषि-मुनियो ने बहुत सरल और कारगर उपाय माना है। पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से मंत्र जाप करने से निश्चित रूप से मनुष्य के सभी दुखों और पापों का शमन होता है। ऐसा कहा गया है-मंत्रों का अर्थ इतना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, जितना इन मन्त्रों की तरंगों को महसूस करना है। ब्रह्माण्ड में हर वस्तु दूसरी किसी भी वस्तु को अपनी और आकर्षित करती है। जब आप मंत्रोचारण या हवन करते हैं, तो उसका वातावरण पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मन्त्रों के उच्चारण द्वारा वातावरण में सकारात्मक तरंगे फैलती है और उनका श्रवण करने से मन शांत होता है। शास्त्रों के अनुसार धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चतुर्विध तत्वों की प्राप्ति के लिए नवरात्र से अच्छा समय दूसरा नहीं माना जाता। इसी लिए इन नौ दिनों में भक्त श्रद्धा के साथ देवी की आराधना मंत्रोच्चार से करते हैं।

आज माँ के कुष्मांडा स्वरूप की पूजा
एक तिथि का हास होने के कारण आज माँ कूष्मांडा की आराधना की जाएगी। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है। माँ के मुख्य मंत्र ‘ॐ कूष्मांडा देव्यै नमः’ का 108 बार जाप करें या सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं। माँ को इस मंत्र से भी याद कर सकते हैं।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

ध्यान
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र पाठ
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥
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Post Author: Soni

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