प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्…

नवरात्र में कलश स्थापना करना मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार कलश के मुख में भगवान विष्णु का कंठ तथा मूल में ब्रह्माजी का वास माना गया है। यह सुख-समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है। इस बार दूसरी तिथि का क्षय माना गया है, इसलिए शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा एक दिन की जाएगी। इस बार पंचमी तिथि 13 व 14 अक्टूबर को रहेगी।

माँ दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा विधि
मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचें लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। इसके ऊपर केशर से शं लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें। मंत्र इस प्रकार है-

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:।

मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें। इसके बाद भोग प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। यह जप कम से कम 108 होना चाहिए।

मंत्र – ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां के चरणों में अपनी मनोकामना को व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा श्रद्धा से आरती कीर्तन करें।

स्रोत पाठ
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा विधि
देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा में सर्वप्रथम माता की फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें तथा उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को प्रसाद अर्पित करें. प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें. कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें.

देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें-

इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु
देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा

इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल व कमल बेहद प्रिय होते हैं अत: इन फूलों की माला पहनायें, घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें.

“मां ब्रह्मचारिणी का स्रोत पाठ”

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥
“मां ब्रह्मचारिणी का कवच”
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

नवरात्र में नव रंग का महत्व
नवरात्र में रंगों का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है जो लोग इस दौरान दिन के हिसाब से विशेष रंग के कपड़े पहनता है तो उसको विशेष लाभ मिलता है। नौ दिनों में नौ रंगों के कपड़े पहनने और मां के नौ रूपों की पूजा करने से व्यक्ति की मनोकामना पूरी हो सकती है। आइए आज जानते हैं दिन के हिसाब से नवरात्र में किस रंग के कपड़े पहनें –

पहला दिन- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी की पूजा- इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है।

दूसरा दिन- चंद्रघंटा पूजा- इस दिन हरे रंग के कपड़े से विशेष लाभ मिलता है।

तीसरा दिन- कुष्मांडा पूजा- इस दिन ग्रे रंग के कपड़े पहनने से माता कुष्मांडा प्रसन्न होती है।

चौथा दिन- स्कंदमाता पूजा- इस दिन नारंगी के कपड़े पहनने से स्कंदमाता की कृपा मिलती है।

पांचवां दिन- सरस्वती पूजा- नवरात्र के पांचवें दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है और इस दिन सफेद कपड़े पहनने से मां सरस्वती की विशेष कृपा मिलती है।

छठा दिन- कात्यायनी पूजा- छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है और इस दिन लाल रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है।

सातवां दिन- कालरात्रि, सरस्वती पूजा- इस दिन नीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। इस रंग के कपड़े पहनने से मां कालरात्रि प्रसन्न होती है।

आठवां दिन- महागौरी, दुर्गा अष्टमी ,नवमी पूजन- इस दिन गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर पूजा करना से शुभ माना जाता है।

नौवें दिन- नवमी हवन, नवरात्रि पारण- नौवें दिन बैंगनी रंग पहनना शुभ होता है। इस दिन इस रंग के कपड़े पहनकर मां दुर्गा की पूजा करना शुभ होता है।

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Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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