बुलंदी देर तक किस शख्श के हिस्से में रहती है

बुलंदी देर तक किस शख्श के हिस्से में रहती है,
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है।

ये ऐसा कर्ज है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ सजदे में रहती है।

जी तो बहुत चाहता है इस कैद-ए-जान से निकल जाएँ हम,
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है।

अमीरी रेशम-ओ-कमख्वाब में नंगी नजर आई,
गरीबी शान से एक टाट के परदे में रहती है।

मैं इंसान हूँ बहक जाना मेरी फितरत में शामिल है,
हवा भी उसको छू के देर तक नशे में रहती है।

मोहब्बत में परखने जांचने से फायदा क्या है,
कमी थोड़ी बहुत हर एक के शजर* में रहती है।

ये अपने आप को तकसीम* कर लेते है सूबों में,
खराबी बस यही हर मुल्क के नक्शे में रहती है।
■ मुनव्वर राना
(शजर = पेड़, तकसीम= बांटना)

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *