माँझी मल्हार -५

Rishi Agastya

बचपन कच्ची मिट्टी के समान होता है। बड़े-बुजुर्ग बच्चों को जिस साँचे में ढ़ालना चाहे ढ़ाल सकते हैं। एक बार तपकर मिट्टी जब कठोर हो जाती है, तो उसे ढ़ालना नामुमकिन होता है। उसे प्रहार से ढ़ालना चाहेंगे, तो मिट्टी टूट जाएगी। गंगा के घाटों पर न जाने कितना समय बीत गया, पर यहां किस्से-कहानियों का दौर आज भी जारी है। पुरखे आने वाली पीढ़ी को बातों-बातों में पिछला ज्ञान दे जाते हैं और समय यहाँ अनवरत एक सा बना रहता है। घंट-घड़ियाल, मंदिर, गंगा, शिव, घाट, और उस पर बसने वाले मांझी भी; सभी तो वही हैं, जो पहले थे, बस अब उनके नाम और चेहरे बदल गए हैं।

 

एक बार बचपन में हम रात के अँधेरे में गंगा तट पर बैठे थे, तो इन्हीं कहानियों के दौर में पुरखों ने सप्तऋषि की कहानी बताई। वो बता रहे थे जलप्रलय के उपरान्त जब सृष्टि मनु के साथ प्रारम्भ हुई, तो वो सप्तऋषि ही थे जिनकी हम संतान हैं। इन सप्तऋषियों में वो बड़े गर्व से अगस्त्य ऋषि का नाम ले रहे थे। माना जाता हैं कि ऋषि अगस्त्य, अरुण-वरुण और उर्वशी की संतान थे। एक मान्यता यह भी हैं कि अगस्त्य मुनि वशिष्ठ के बड़े भाई थे। ऋषि अगस्त्य का जन्म आज से लगभग ५००० ई० पू० काशी में हुआ था। पुरखे बताते हैं कि ऋषि अगस्त्य का विवाह विदर्भ की राजकुमारी लोपामुद्रा से हुआ, मंत्र-दृष्टा अगस्त्य का तपोबल इतना श्रेष्ठ था कि जब भगवान् शंकर सभी ऋषियों को बुलाकर वेद और तंत्र का रहस्य बता रहे थे, तो स्वयं भगवान शंकर ने इनसे दक्षिण जाने का आग्रह किया, जिससे एक ओर झुक रही पृथ्वी का संतुलन बना रहे।

 

काशी को छोड़ने का दुःख मंत्र-दृष्टा अगस्त्य को भी हुआ, पर शिव का आग्रह वो टाल नहीं पाए। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने विंध्य पर्वत का मान-मर्दन किया और कमण्डल में लिए गंगाजल से कावेरी नदी का निर्माण किया। पुरखे उनकी दक्षिण यात्रा का विवरण बड़े विस्तार से बता रहे थे।

 

बड़े होने पर कुछ किताबी ज्ञान हमने भी बटोरा और जो नहीं समझा उसका उत्तर अक्सर गंगा तट पर बातों-बातों में पाया। ऋग्वेद के कई मंत्र इनके द्वारा दृष्ट हैं। अगस्त्य ऋषि को दक्षिण भारत में सिद्धा अर्थात आयुर्वेद का जनक माना जाता है। तमिल भाषा के निर्माण में भी इनका सहयोग माना जाता है। ऋषि अगस्त्य ने ‘अगस्त्य संहिता’ नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ की बहुत चर्चा होती है। इस ग्रंथ की प्राचीनता पर भी शोध हुए हैं। माना जाता है इसमें वर्णित श्लोक विद्युत उत्पन्न करने का विवरण देते हैं।

 

जाने पुरखे कौन सा ज्ञान बता गए, जिसे लोग आज तक खोजते फिरते हैं; पर जानने को जितना उन्होंने प्रेरित किया और जितना उनसे सीखा गया उतना कोई शायद ही आज प्रेरित कर पाए।

Post Author: Sid

Lecturer by profession, entrepreneur by head but writer by heart. Likes to play and loves to travel. Nature lover and writer of perpetuity. Aficionado of Rudyard Kipling poetry and fiction

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