मैं स्त्री और तुम पुरुष

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष :

दरिया किनारे बैठे-बैठे
यकायक ये ख्याल आया
तुम इन पत्थरों से ही तो हो
एकदम अडिग, अहम से भरे
पर मैं भी तो इन लहरों सी हूं
बार-बार लौटकर आउंगी,
पूछने
क्या तुम जरा भी डिगे,
और तुम
फिर दोगुने अहम के साथ मुझे ढकेल दोगे
और मैं लौट जाऊंगी, कुछ मायूस सी
कुछ पल लग जाएंगे खुदको बटोरने में
किंतु
फिर लौटूंगी, दोगुने साहस से
और, फिर से करूंगी प्यार का मनुहार,
जरा सा पिघलने की गुजारिश
क्योंकि
मैं स्त्री हूं और तुम पुरुष
दुत्कारना तुम्हारी फितरत है और बदलने की कोशिश करना मेरी आदत।।
सोनी सिंह (महिला दिवस पर कुछ शब्दों को पिरोने की एक कोशिश)

Post Author: Soni

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