काशी सत्संग : नारायण मंत्र

एक दिन नारद मुनि ‘नारायण, नारायण’ कहते हुए धरती पर विचरन कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक किसान परमानंद की अवस्था में अपनी जमीन जोत रहा था। नारदजी को यह जानने की उत्सुकता हुई कि उसके आनंद का राज क्या है! जब वह उस किसान से बात करने पहुंचे, तो वह अपनी जमीन को जोतने में इतना डूबा हुआ था कि उसने नारदजी की ओर ध्यान भी नहीं दिया। दोपहर के समय, उसने काम से थोड़ा विराम लिया और खाना खाने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठा। उसने बर्तन को खोला, जिसमें थोड़ा सा भोजन था। उसने सिर्फ ‘नारायण, नारायण, नारायण’ कहा और खाने लगा।
किसान अपना खाना उनके साथ बांटना चाहता था, मगर जाति व्यवस्था के कारण नारदजी उसके साथ नहीं खा सकते थे। नारदजी ने पूछा, ‘तुम्हारे इस आनंद की वजह क्या है?’ किसान बोला, ‘हर दिन नारायण अपने असली रूप में मेरे सामने आते हैं। मेरे आनंद का बस यही कारण है।’ नारदजी को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने पूछा, ‘तुम कौन सी साधना करते हो?’
किसान बोला, ‘मुझे कुछ नहीं आता। मैं एक अज्ञानी, अनपढ़ आदमी हूं। बस सुबह उठने के बाद मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम शुरू करते समय मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम खत्म करने के बाद मैं फिर तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। जब मैं खाता हूं, तो तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं और जब सोने जाता हूं, तो भी तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं।’ नारदजी ने गिना कि वह खुद 24 घंटे में कितनी बार ‘नारायण’ बोलते हैं। वह लाखों बार ऐसा करते थे। मगर फिर भी उन्हें नारायण से मिलने के लिए वैकुण्ठ तक जाना पड़ता था, जो बहुत ही दूर था। मगर खाने, हल चलाने या बाकी कामों से पहले सिर्फ तीन बार ‘नारायण’ बोलने वाले इस किसान के सामने नारायण वहीं प्रकट हो जाते थे। नारदजी को लगा कि यह ठीक नहीं है, इसमें जरूर कहीं कोई त्रुटि है।
वह तुरंत वैकुण्ठ पहुंच गए और उन्होंने विष्णुजी से पूछा, ‘मैं हर समय आपका नाम जपता रहता हूं, मगर आप मेरे सामने प्रकट नहीं होते। मुझे आकर आपके दर्शन करने पड़ते हैं। मगर उस किसान के सामने आप रोज प्रकट होते हैं और वह परमानंद में जीवन बिता रहा है!’ भगवान विष्णु ने नारद की ओर देखा और लक्ष्मी को तेल से लबालब भरा हुआ एक बर्तन लाने को कहा। उन्होंने नारद से कहा, ‘पहले आपको एक काम करना पड़ेगा। तेल से भरे इस बर्तन को भूलोक ले जाइए। मगर इसमें से एक बूंद भी तेल छलकना नहीं चाहिए। इसे वहां छोड़कर आइए, फिर हम इस प्रश्न का उत्तर देंगे।’ नारद तेल से भरा बर्तन लेकर भूलोक गए, उसे वहां छोड़ कर वापस आ गए और बोले, ‘प्रभु! अब मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए।’
भगवान विष्णु ने पूछा, ‘जब आप तेल से भरा यह बर्तन लेकर जा रहे थे, तो आपने कितनी बार नारायण बोला?’ नारद बोले, “उस समय मैं ‘नारायण’ कैसे बोल सकता था? आपने कहा था कि एक बूंद तेल भी नहीं गिरना चाहिए, इसलिए मुझे पूरा ध्यान उस पर देना पड़ा। मगर वापस आते समय मैंने बहुत बार ‘नारायण’ कहा।”
भगवान विष्णु मुस्कुराते हुए बोले, ‘यही आपके प्रश्न का उत्तर है। उस किसान का जीवन तेल से भरा बर्तन ढोने जैसा है, जो किसी भी पल छलक सकता है। अपनी अति व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वह मेरा स्मरण करना नहीं भूलता, जबकि आप थोड़ी सी मुश्किल परिस्थिति में ‛नारायण’ का सुमिरन भूल गए।’
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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