काशी सत्संग: भक्त की भावना

एक गांव में एक पंडित जी रहते थे। किसी गांव में जाकर एक बार वो कथा सुना रहे थे। प्रसंग में श्रीकृष्ण जी के ऐश्वर्य जीवन और उनके विलक्षण आभूषणों का वर्णन का पाठ चल रहा था। वहां कई श्रोता पंडितजी की कथा सुन रहे थे।
उनमें से एक डाकू भी था। जब पंडितजी घर जाने लगे, तो डाकू भी उनके पीछे चल पड़ा। उसने पंडितजी से कहा, ‘आप जिस गोपाल की बात कर रहे थे, वह कहां रहता है। मुझे गोपाल के गहने चाहिए। जिनका वर्णन आपने अभी-अभी कथा के दरम्यान किया।’
पंडितजी समझ गए कि यह डाकू है। उन्होंने अपनी गठरी उसके सिर पर रख दी और बोले, ‘में तुम्हें गोपाल का पात जरूर बताउंगा।’ पंडितजी ने डाकू को से कहा, ‘गोपाल मथुरा, वृंदावन में रहते हैं।’ डाकू पंडितजी का शुक्रिया अदा कर वहां की ओर चला गया।
उसने वहां पहुंचकर गोपाल को खोजा, लेकिन वहां गोपाल नहीं मिले। तभी उसने देखा एक सुंदर सा बालाक गायों को घांस खिला रहा है। बालक का रूप देख कर डाकू मोहित हो गया और प्रभु की कृपा व दर्शन से उसका मन भी पवित्र हो गया। वह श्रीकृष्ण से बोला, ‘मैं इसी तरह आपको रोज देखना चाहता हूं। इस तरह वह डाकू मरने के बाद परमधाम को प्राप्त हुआ।’
मित्रों, सार यह है कि भगवान भाव को ग्रहण करते हैं। उन्हें पाने की इच्छा होने पर हर विकार अपने आप मिट जाते हैं। यदि उनके प्रति व्याकुलता न हुई, तो सारा जीवन कथा सुनने करने पर भी कुछ नहीं मिलता।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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