काशी सत्संग: बिन ज्ञान, सब व्यर्थ

एक बूढ़ी हर दिन मंदिर के सामने भीख मांगती थी। एक बार मंदिर से किसी साधु ने उस बुढ़िया को देखकर इस प्रकार पूछा- “आप अच्छे घर से आई हुई लगती हैं। आपका बेटा अच्छा लड़का है ना? फिर यहां हर दिन क्यों खड़ी होती है?”
उस बुढ़िया ने कहा- “बाबा, आप तो जानते हैं, मेरा एक ही पुत्र है। बहुत साल पहले ही मेरे पति का स्वर्गवास हो गया। मेरा बेटा आठ महीने पहले मुझे छोड़कर नौकरी के लिए चला गया। जाते समय वह मेरे खर्चे के लिए कुछ रुपए देकर गया। वह सब खर्च हो गया। मैं भी बूढ़ी हो गई हूं, परिश्रम करके धन नहीं कमा सकती। इसीलिए देव मंदिर के सामने भीख मांग रही हूं।”
साधु ने कहा- “क्या तुम्हारा बेटा अब पैसे नहीं भेजता?
बुढ़िया ने कहा- “मेरा बेटा हर महीने एक-एक रंगबिरंगा कागज भेजता है। ‌मैं उसको चूम कर अपने बेटे के स्मरण में दीवार पर चिपकाती हूं।”
साधु ने उसके घर जाकर देखने को निश्चय किया। अगले दिन वह उसके घर में दीवार को देख कर आश्चर्यचकित हो गया। उस दीवार पर आठ धनादेश पत्र चिपका के रखे थे। एक एक चेक 50,000 रुपये राशि का था। वह बुढ़िया पढ़ीलिखी नहीं थी। इसीलिए वह नहीं जानती थी कि उसके पास कितनी संपत्ति है। वह साधु उस विषय को जानकर उस बुढ़िया को उन धनादेशों का मूल्य समझाया।
हम भी उसी बुढ़िया की तरह हैं। हमारे पास जो धर्म के ग्रंथ है, उसका मूल्य नहीं जानकर उसे माथे से लगाकर अपने घर में सुरक्षित रखते हैं। उनको पढ़ते नहीं हैं, इसलिए उसकी उपयोगिता को समझ नहीं पाते।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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