काशी सत्संग: भक्तवत्सल श्रीकृष्ण

बहुत समय पहले वृन्दावन में श्रीबांके बिहारीजी के मंदिर में एक पुजारी थे। वह रोज बड़े भाव से बिहारीजी की सेवा करते थे और रात्रि विश्राम के समय भगवान के बिस्तर के पास चार लड्डू रख देते थे। पुजारी जी का लड्डू रखने के पीछे भाव यह था कि बिहारीजी को यदि रात में भूख लगेगी तो वे उठ कर खा लेंगे। पुजारी जी जब सुबह मंदिर के पट खोलते थे, तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था। इसी भाव से वे रोज ऐसा करते चले आ रहे थे। एक दिन बिहारीजी को शयन कराने के बाद वे चार लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बंद कर दिया और घर चले गए।
उसी रात एक घटना घटी। पुजारी जी बूंदी के लड्डू जिस दुकान से लाते थे, उसके मालिक हिसाब-किताब कर देर रात जब दुकान बंद करने की तैयारी में थे, तभी एक छोटा सा बालक आया और बोला- बाबा मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए।
बाबा ने कहा- लाला लड्डू तो सारे खत्म हो गए। अब तो मैं दुकान बंद करने जा रहा हूं। बालक बोला- आप अंदर जाकर देखो, आपके पास चार लड्डू रखे हैं। उसके हठ करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हें चार लड्डू मिल गए, क्योंकि वे आज मंदिर नहीं गए थे।
बाबा ने कहा- पैसे दो। बालक ने कहा- मेरे पास पैसे तो नहीं हैं और तुरंत अपने हाथ से सोने का कंगन उतारा और बाबा को देने लगा। इस पर बाबा ने कहा- लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो, कल अपने बाबा से कह देना, मैं उनसे ले लूंगा।
बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फेंक कर भाग गया। सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो उन्होंने देखा कि बिहारीजी के हाथ में कंगन नहीं हैं। यदि चोर भी चुराता तो केवल कंगन ही क्यों चुराता!
यह बात थोड़ी देर में चारों ओर फैल गई। जब उस दुकान वाले को पता चला, तो उसे रात की बात याद आई। उसने अपनी दुकान में कंगन ढूंढा और पुजारी जी को दिखाया और सारी बात सुनाई। इसके बाद पुजारी जी को याद आया कि रात में मैं लड्डू रखना ही भूल गया था। इसीलिए बिहारीजी स्वयं लड्डू लेने गए थे। यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है, तो भगवान अपनी तरफ से पूरा कर लेते हैं। राधे-राधे।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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