काशी सत्संग: अंधकार की दुविधा

एक बार अंधकार ने भगवान के पास जाकर शिकायत की, ‘भगवान ये सूर्य मेरे पीछे बुरी तरह पड़ा है। मैं इससे बहुत परेशान हूं। यह व्यर्थ ही मेरा पीछा करता रहता है। मैं थोड़ी देर के लिए भी विश्राम नहीं कर पाता हूं। सदियों से ऐसा ही चलता आ रहा है।’
अंधकार की बात सुनकर भगवान ने कहा, ‘सचमुच ये तो बहुत गलत बात है। मैं अभी सूर्य देव को बुलाकर इस बारे में पूछता हूं।’
सूर्यदेव से जब भगवान ने कहा, ‘अंधकार के पीछे तुम क्यों पड़े रहते हो!’ तब सूर्य देव ने कहा, ‘मैंने अंधकार को कभी देखा ही नहीं। मैं उसे क्यों परेशान करूंगा। आप अंधकार का मेरे सामने सामना कराएं प्रभु। यदि मुझसे गलती हो जाए, तो मैं क्षमा मांग लूंगा।’ भगवान ने अंधकार को बुलाया, लेकिन वह गायब हो गया।
मित्रों, सार यह है कि सूर्य प्रकाश यानी सकारात्मकता का प्रतीक है और अंधेरा नकरात्मकता का प्रतीक है। जब सूर्य रहता है, तो अंधकार का अस्तित्व नहीं रहता। इसी तरह मनुष्य के भय के संबंध में भी यही स्थिति बनती है। हम भय दूर करने की कोशिश करते हैं, लेकिन भय दरअसल होता ही नहीं है।
ऊं तत्सत….
कन्नड़ लेखक एच. योगनसिंहम् ने महर्षि कर्वे ( भारतरत्न 1958 धोंडो केशव कर्वे) की आत्मकथा ‘लुकिंग-बैक’ का कन्नड़ में अनुवाद किया था। उनसे सिर्फ पत्र व्यवहार द्वारा ही परिचय था, पर महर्षि कर्वे से वह कभी मिले नहीं थे।
एक बार जब वे पूना गए, तो वे महर्षि कर्वे से भेंट करना चाहते थे। उनकी यह मनोकामना पूरी हुई। उनकी भेंट कर्वे से उनके आवास पर हुई। औपचारिक बातों के बाद महर्षि कर्वे ने उनसे घरेलू सवाल पूछा, ‘आपके कितने बच्चे हैं?’
लेखक की तरफ से जवाब मिला, ‘आठ’ महर्षि ने कहा, ‘तो इसका मतलब यह हुआ कि राष्ट्र को आपकी देन मुझसे दोगुनी है।’ योगनरसिंहम चकरा गए। महर्षि की अपेक्षा उनकी राष्ट्र सेवा दोगुनी? इस तरह उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि में महर्षि की तरफ देखा।
मुस्कुराते कर्वे बोले, ‘आठ…चार के दोगुने आठ’ हुए की नहीं और महर्षि हंसने लगे। महर्षि कर्वे आखिर में थे, गणित के प्राध्यापक। उनका गणित आगंतुक की समझ में आ गया और वे अपनी हंसी न रोक पाए।
जिंदगी में हंसने के बहाने ढूंढ लेना ही चाहिए। ऐसा बिल्कुल भी नहीं कि, यदि आप किसी विषय के विद्वान व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं। तो ये बिल्कुल भी अनुमान न लगाएं वह बहुत ही गंभीर होंगे। हो सकता है वो आपके आने के कारण थोड़ा मुस्कुरा दें।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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