काशी सत्संग: ब्राह्मण और प्रेत

बहुत पुरानी बात है। पृथु नामक एक कर्मनिष्ठ ब्राम्हण थे। भगवान के परम भक्त पृथु ने अपने मन व इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया था। वे सभी प्राणियों में परमात्मा का दर्शन करते थे और भलाई करते थे।
एक बार पृथु तीर्थ यात्रा के लिए निकले। कुछ दूर जाने पर मार्ग में एक ऐसा स्थान मिला, जहां न पानी था, न कोई वृक्ष। वह भूमि कांटों से भरी थी। इतने में उनकी दृष्टि पांच भयानक आकृतियों पर पड़ी। कुछ पल को ब्राह्मण के ह्रदय में भय का संचार हुआ, किंतु फिर उन्होंने पूछा- तुम लोग कौन हो? तुम्हारे रूप इतने विकराल क्यों हैं?
प्रेतों ने कहा- हम बहुत दिनों से भूख-प्यास से पीड़ित हैं। हमारा ज्ञान, विवेक सब नष्ट हो गया है। हम इतना भी समझ नहीं पाते कि कौन सी दिशा किधर है! हमें न पृथ्वी दिखती है न आकाश। हम लोग बहुत कष्ट में हैं। हममें से एक का नाम पायुषित, दूसरे का नाम सुचिमुख, तीसरे का नाम शीघ्रग, चौथे का नाम रोधक और पांचवे का नाम लेखक है।
उनके नाम सुनकर पृथु को आश्चर्य हुआ। इस पर प्रेतों में से एक ने कहा- जब मैं मनुष्य था, तब मैं तो स्वयं तो स्वादिष्ट भोजन करता ही था, दूसरों को भी बासी (पायुषित) भोजन करवाता था, इसलिए मेरा नाम पायुषित पड़ा। मेरे इस साथी का नाम सुचिमुख इसलिए है, क्योंकि जब भी कोई इससे भोजन मांगता था तो यह उसके साथ हिंसा करता था। इससे इसका मुख सुई जैसा हो गया और नाम सूचिमुख पड़ गया। भोजन मिलने पर भी अब यह उसे खा नहीं पाता। तीसरे का नाम शीघ्रक इसलिए पड़ा, क्योंकि इससे जब कोई भोजन मांगता, तो ये शीघ्रता पूर्वक भाग जाता था। चौथा किवार बंद करके स्वादिष्ट भोजन करता था, इसलिए उसका नाम रोधक पड़ा। और पांचवे से जब कोई कुछ मांगता था, तो जमीन पर कुछ लिखने लगता था, इसलिए इसका नाम लेखक पड़ा।
अब ब्राम्हण ने पूछा- तब तुम सब खाते क्या हो? सारे प्रेत लज्जित हो गए और बोले- हम मनुष्य का मलमूत्र खाते हैं। हम सिर्फ उसी घर में जाते हैं, जिस घर में अपवित्रता रहती है। जहां प्रभु वंदना नहीं होती। दुखी प्रेतों ने पृथु से कहा- हे ब्रम्हाण देव! हम बहुत दुखी हैं। आपकी वाणी से हमें सुख मिलता है। कृपया बताइए किस कर्म से प्रेत योनि मिलता है? ब्राम्हण ने कहा- जो पितरों, गुरु, देवता की सेवा करता हो। जिसके हृदय में सारे प्राणियों के लिए दया हो और जो छह अवगुणों ( काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईर्ष्या) को जीत लेता है। वह प्रेत योनि में नहीं पड़ता। जो बुरे कर्मों में लिप्त रहते है। मांस-मदिरा का सेवन करता है और पराई स्त्री पर कुदृष्टि रखता है, वो प्रेत योनि में पड़ता है।
ब्राम्हण की बात पूरी होते ही नगारों की आवाज गूंजने लगी। फूलों की वर्षा होने लगी। साथ ही पांच विमान भी उतर आए। इसके बाद आकाशवाणी सुनाई दी, “ब्राह्मण से सत्कर्म पर चर्चा और ब्राह्मण के पुण्यकर्मों के कीर्तन के प्रभाव से पांचों प्रेतों को दिव्य लोक मिलता है। देखते-देखते पांचो प्रेत दिव्य शरीर धारण कर दिव्य लोक चले गए। (कथा श्रोत-पद्मपुराण)
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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