काशी सत्संग: खेल-खेल में…

एक युवक ने किसी मठ के महंत से कहा- “मैं साधु बनना चाहता हूं, लेकिन एक समस्या ये है कि मुझे कुछ भी नहीं आता केवल एक चीज के और वो है शतरंज। लेकिन शतरंज से मुक्ति तो नहीं मिलती और एक दूसरी बात जो मैं जानता हूं वो ये है कि सभी प्रकार के आमोद-प्रमोद के साधन जो हैं, वो पाप है। इन दोनों बातों के अलावा मुझे कोई अधिक ज्ञान नहीं।”
इस पर महंत ने उस युवक से कहा-“हां, वे पाप तो हैं, लेकिन उन से मन भी बहलता है और क्या पता उस मठ को उनसे भी कोई लाभ पहुंचे!” ऐसा कहकर महंत ने शतरंज की एक बिसात बिछाई और युवक को शतरंज की एक बाजी खेलने को कहा। जब खेल शुरू होने वाला था महंत ने उस युवक को कहा कि देखो, “हम शतरंज की एक बाजी खेलेंगे और अगर मैं हार गया, तो मैं इस मठ को हमेशा के लिए छोड़ दूंगा और तुम मेरा स्थान ले लोगे।” युवक ने देखा महंत वास्तव में गंभीर था, तो युवक के लिए अब ये बाजी जिन्दगी और मौत का सवाल बन गई थी, क्योंकि वो मठ में रहना चाहता था, इसलिए उसे ये डर सताने लगा कि मैं हार न जाऊ ।
खेल शुरू हुआ। युवक के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रही थीं। महंत ने खराब शुरुआत की और युवक ने कई कठोर चालें चलीं, लेकिन उसने क्षण भर के लिए जैसे ही महंत के चेहरे को देखा । फिर जानबूझकर खराब खेलने लगा। अचानक ही महंत ने बिसात को ठोकर मारकर जमीन पर गिरा दिया। महंत ने कहा, “तुम्हें जितना सिखाया गया था, तुम उस से कही ज्यादा जानते हो। तुमने अपना पूरा ध्यान जीतने पर लगाया और अपने सपनों के लिए लड़ सकते हो। फिर तुम्हारे भीतर करूणा जाग उठी और तुमने भले कार्य के लिए त्याग करने का निश्चय कर लिया।” महंत ने आगे कहा, “तुम्हारा इस मठ में स्वागत है, क्योंकि तुम जानते हो कि कैसे अनुशासन और करुणा में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है।”
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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