काशी सत्संग : अंधेर नगरी

एक बार एक हंस और हंसिनी सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में पहुंच गए। भटकते-भटकते शाम हो गई, तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात यहीं बिता लो, सुबह हम लोग वापस अपने घर लौट चलेंगे! हंसिनी सहमत हो गई।
रात हुई, तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था। वह जोर से चिल्लाने लगा। हंसिनी ने हंस से कहा, ‘यहां तो एक रात भी रुकना मुश्किल है, ये उल्लू चिल्ला रहा है।’ हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यों है! ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे, वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।
पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुन रहा था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ कर दो। हंस ने कहा कि कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद! यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, ‘अरे हंस, मेरी पत्नी को लेकर कहां जा रहे हो।’
हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी! अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!’
उल्लू जिद पर अड़ गया कि यह उसकी पत्नी है। इसे लेकर दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के पक्षी एकत्र हो गए, पर विवाद नहीं सुलझा। अंत में बात पंचायत तक पहुंची। पंचों ने दोनों का पक्ष सुना। फिर, आपस में मिलकर पंचों ने विचार किया कि उल्लू हमारे बीच रहता है और आगे भी रहेगा, सो फैसला उसके हक में ही होना चाहिए। इसके बाद पंचों ने कहा कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल वहां से जाने का हुक्म दिया।
यह सुनकर रोता-बिलखता हंस वहां से जाने लगा, तभी उल्लू ने आवाज लगाई,“हे मित्र हंस, रुको!”हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे! तब उल्लू बोला, “नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था, तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है, क्योंकि यहां उल्लू रहता है! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहां उल्लू रहता है, बल्कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है, क्योंकि यहां पर ऐसे पंच रहते हैं, जो उल्लुओं के हक में फैसला सुनाते हैं।”
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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