काशी सत्संग: …अब पछताए होत क्या!

एक मछुआरा था, जो मछलियों को पकड़कर और उन्हें बेचकर अपना व परिवार का भरण-पोषण करता था। एक दिन वह सुबह से शाम तक नदी में जाल डालकर मछलियां पकड़ने की कोशिश करता रहा, लेकिन एक भी मछली जाल में न फंसी। जैसे-जैसे सूरज डूबने लगा,उसकी निराशा गहरी होती गई। भगवान का नाम लेकर उसने एक बार और जाल डाला, पर इस बार भी वह असफल रहा। किंतु इस बार एक वजनी पोटली उसके जाल में अटकी।
मछुआरे ने पोटली को निकाला और टटोला तो झुंझला गया और बोला- ‛हाय! ये तो पत्थर है!’ फिर मन मारकर वह नाव में चढ़ किनारे की ओर चल पड़ा। बहुत निराशा के साथ कुछ सोचते हुए वह अपने नाव को आगे बढ़ता जा रहा था और मन में आगे के योजनाओं के बारे में सोचता चला जा रहा था। सोच रहा था ‛कल दूसरे किनारे पर जाल डालूंगा। सबसे छिपकर …उधर कोई नहीं जाता….वहां बहुत सारी मछलियां पकड़ी जा सकती है…।’ मन चंचल था, तो फिर हाथ कैसे स्थिर रहता? वह एक हाथ से उस पोटली के पत्थर को एक-एक करके नदी में फेंकता जा रहा था। पोटली खाली हो गई। जब एक पत्थर बचा था, तो अनायास ही उसकी नजर उस पर गई और वह स्तब्ध रह गया। उसे अपने आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। यह क्या! ये तो ‘नीलम’ था।
मछुआरे के पास अब पछताने के अलावा कुछ नहीं बचा था। नदी के बीचोबीच अपनी नाव में बैठा वह सिर्फ अब अपने को कोस रहा था। प्रकृति और प्रारब्ध ऐसे ही न जाने कितने नीलम हमारी झोली में डालता रहता है,जिन्हें पत्थर समझ हम ठुकरा देते हैं।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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