काशी सत्संग: मूलमंत्र

एक प्रसिद्ध लेखक के सम्मान में एक कॉलेज के छात्रों ने भोज का आयोजन किया। उस भोज में नगर के विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे। छात्रों का इतना भव्य आयोजन देखकर लेखक बहुत खुश हुए।
अपने स्वागत भाषण में उन्होंने कहा, ‘इस कॉलेज के छात्र बहुत उत्साही हैं। उत्साह ही सफलता की पहली शर्त है। मैं कामना और आशा करता हूं कि जीवन में चाहे जहां भी रहें ये जरूर सफल रहेंगे।’
जब वे लेखक भाषण समाप्त कर चुके, तो कुछ विद्यार्थियों ने कहा, ‘मान्यवर किसी क्षेत्र में हम भले भी सफल हो जाएं, किंतु सफल लेखक तो बन ही नहीं सकते।’
तब लेखक ने कहा, ‘ऐसा क्यों कह रहे हैं आप।’ तब उन विद्यार्थियों ने कहा, ‘लेखन की प्रतिभा ईश्वर की दी हुई होती है। परिश्रम से पैदा नहीं की जा सकती।’ लेखक ने कहा, ‘ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।’ तभी यकायक उन्हीं छात्रों में से किसी ने प्रश्न किया, ‘तब कोई आप ऐसा गुरु मंत्र बताइए जिससे कि लेखन कार्य किया जा सके।’
लेखक ने कहा, ‘उत्साहपूर्वक कठिन परिश्रम करते रहो यही एक मंत्र है।’ यदि आप सचमुच में लेखक बनना चाहते हैं, तो तुरंत कलम उठाइए और लिख दीजिए जब तक आप आत्ममुग्ध न हो जाएं, लिखते रहिए। मैं तो यही करता हूं। और 95 प्रतिशत लेखक यही करते हैं और वो एक बड़े लेखक बन जाते हैं।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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