काशी सत्संग : अपना अपना स्वभाव

एक बार एक भला आदमी नदी किनारे बैठा था। तभी उसने देखा एक बिच्छू पानी में गिर गया है। भले आदमी ने जल्दी से बिच्छू को हाथ में उठा लिया। बिच्छू ने उस भले आदमी को डंक मार दिया। बेचारे भले आदमी का हाथ कांपा और बिच्छू फिर से पानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबने से बचाने के लिए दोबारा उठा लिया। बिच्छू ने दोबारा उस भले आदमी को डंक मार दिया। भले आदमी का हाथ दोबारा कांपाऔर बिच्छू पानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबने से बचाने के लिए एक बार फिर उठा लिया। एक लड़का उस आदमी का बार-बार बिच्छू को पानी से निकालना और बार-बार बिच्छू का डंक मारना देख रहा था। उसने आदमी से कहा, “आपको यह बिच्छू बार-बार डंक मार रहा है फिर भी आप उसे डूबने से क्यों बचाना चाहते हैं?”
भले आदमी ने कहा, “बात यह है बेटा कि बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और मेरा स्वभाव है बचाना। जब बिच्छू एक कीड़ा होते हुए भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता, तो मैं मनुष्य होकर अपना स्वभाव कैसे छोड़ दूं।”
मित्रों, मनुष्य जीवन परमात्मा का दिया वह वरदान है, जो अपने साथ-साथ दूसरों का भी भला कर सकता है, पर हम अपने मूल स्वभाव से भटक गए हैं।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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