काशी सत्संग: बदलाव ही जीवन है

बदलाव ही जीवन का सार होता है, जहां बदलाव नहीं होता वहां कुछ नहीं होता। शहर के पास बसे एक छोटे से गांव में फलों की बहुत कमी थी। वहां लोग अमीर तो नहीं थे, पर दिल के सच्चे थे। वहां फलों के केवल कुछ पेड़ ही दिखाई देते थे। गांव में फलों की कमी को देखते हुए भगवान ने अपने दूत को बुलाया और कहा, “तुम गांव में जाओ और सभी से कहो कि वह एक दिन में केवल एक ही फल खाये और हो सके तो फलों के पौधे लगाएं।”
दूत ने ऐसा ही किया। उसने सभी को एक फल खाने और फलों के पौधे लगाने को कहा। पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसा ही चलता रहा, और धीरे-धीरे वहां का पर्यावरण संरक्षित होने लगा, क्योंकि बचे हुए फलों के बीजो से और नए-नए पौधे निकल गए थे, और वहां के लोगों ने भी शहर से फलों के छोटे-छोटे पौधे लाकर लगा दिए थे। जो अब बड़े होकर फल देने लगे थे। कुछ वर्षों में ही पूरा गांव हराभरा हो गया था। अब वहां किसी भी फल की कोई कमी नहीं थी, परंतु अब भी वहां रहने वाले एक दिन में केवल एक ही फल खाते थे। इतना ही नहीं, वह खुद तो दिन में केवल एक ही फल खाते थे, और अगर शहर कोई उनसे फल लेने आता, तो वह उसे भी खाली हाथ लौटा देते थे।
परिणामस्वरूप धीरे-धीरे बड़ी मात्रा में फल बर्बाद होने लगे। फल सड़क पर भी इधर-उधर बिखरे दिखाई देते। भगवान को यह सब देखकर बहुत बुरा लगा, और उन्होंने तुरन्त अपने एक दूत को बुलाया और कहा, “जाओ और गांव वालों से कहो वह अब जितना मर्जी फल खाये, और बचे हुए फलों को दूसरे शहरों में को बाट दे।”
दूत यह सन्देश लेकर गांव में गया, मगर इस बार गांव वालों ने उसकी एक ना सुनी और उसे मार कर भगा दिया। गांव वालों के दिमाग में अपने पूर्वजों की बात इतनी गहरी तरह बैठ चुकी थी कि वह अब किसी की कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। वो फलों को बर्बाद करने के लिए तैयार थे, परन्तु अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं थे। वैसे ही, हमारे समाज में आज भी कई ऐसी मान्यताएं का पालन किया जा रहा है, जो आज के बदलते समाज में तर्कसंगत नहीं लगते। हमें भी समय के बदलते हुए स्वरुप को देखते हुए, अपनी सोच को निरन्तर विकसित करना चाहिए। जो आज सही है, वो कल गलत हो सकता है, और जो कल गलत सकता है, वो परसो सही भी हो सकता है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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