काशी सत्संग: राजा जैसा वृद्ध

राजा भोज एक दिन नदी के किनारे टहल रहे थे। वे हरे-भरे वृक्षों और सुंदर फूलों को निहार रहे थे। तभी उन्हें सिर पर लकड़ियों लादकर ले जाता एक व्यक्ति दिखा। उस वृद्ध व्यक्ति के सिर पर लदा बोझ बहुत भारी था और वह पसीने से तर हो रहा था, लेकिन वह प्रसन्न दिखायी दे रहा था। राजा ने उस व्यक्ति को रोकते हुए पूछा- “सुनो, तुम कौन हो?” उस व्यक्ति ने प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया- “मैं राजा भोज हूं।” यह सुनकर राजा भोज भौचक्के रह गए और पूछा– “कौन?”
उस व्यक्ति ने पुनः उत्तर दिया– “राजा भोज!” राजा भोज जिज्ञासा से भर गए। वे बोले- “यदि तुम राजा भोज हो, तो अपनी आय के बारे में बताओ?” लकड़हारे ने उत्तर दिया– “हां, हां क्यों नहीं, मैं प्रतिदिन छह पैसा कमाता हूं।”
राजा ने आश्चर्य से भर गए कि कोई व्यक्ति छह पैसे प्रतिदिन कमाकर भी अपनेआप को राजा कैसे मान सकता है! उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा- “यदि तुम सिर्फ छह पैसे प्रतिदिन कमाते हो, तो तुम्हारा खर्च कितना है? क्या तुम वास्तव में राजा भोज हो?”
उस वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया– “यदि आप वास्तव में जानना चाहते हैं, तो मैं बताता हूं। मैं प्रतिदिन छह पैसा कमाता हूं। उसमें से एक पैसा मैं अपनी पूंजी के मालिक को देता हूं, एक पैसा मंत्री को और एक ऋणी को। एक पैसा मैं बचत के रूप में जमा करता हूं, एक पैसा अतिथियों के लिए और शेष एक पैसा मैं अपने खर्च के लिए रखता हूं।” अब तक राजा भोज पूर्णतः विस्मित हो चुके थे। राजा ने फिर पूछा– “कृपया विस्तार से बताओ, मुझे कुछ ठीक से समझ में नहीं आया।”
लकड़हारे ने उत्तर दिया- “ठीक है! मेरे माता-पिता मेरी पूंजी के मालिक हैं, क्योंकि उन्होंने मेरे लालन-पालन में निवेश किया है। उन्हें मुझसे यह आशा है कि बुढ़ापे में मैं उनकी देखभाल करूं। उन्होंने मेरे लालन-पालन में यह निवेश इसीलिए किया था कि समय आने पर मैं उन्हें उनका निवेश ब्याज समेत लौटा सकूं। क्या सभी माता-पिता अपनी संतान से यह अपेक्षा नहीं करते?”
राजा ने तत्परता से पूछा– “और तुम्हारा ऋणी कौन है?” वृद्ध व्यक्ति ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया– “मेरे बच्चे! वे नौजवान हैं। यह मेरा फर्ज है कि मैं उनका सहारा बनूं। लेकिन जब वे वयस्क और कमाने योग्य हो जाएंगे, तब उन्हें भी मेरा निवेश उसी प्रकार लौटाना चाहिए, जैसे मैं अपने माता-पिता को लौटा रहा हूं।”
राजा ने कम शब्दों में पूछा– “और तुम्हारा मंत्री कौन है? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया– “मेरी पत्नी! वही मेरा घर चलाती है। मैं उसके ऊपर शारीरिक और भावनात्मक रूप से निर्भर हूं। वही मेरी सबसे अच्छी मित्र और सलाहकार है।“
राजा ने संकोचपूर्वक पूछा– “तुम्हारा बचत खाता कहां है?” वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया– “जो व्यक्ति अपने भविष्य के लिए बचत नहीं करता, उससे बड़ा बेवकूफ और कोई नहीं होता। जीवन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। प्रतिदिन मैं एक पैसा अपने खजाने में जमा करता हूं।”
राजा बोले- “कृपया बताना जारी रखें।” लकड़हारे ने उत्तर दिया- “पांचवा पैसा मैं अपने अतिथियों की खातिरदारी के लिए सुरक्षित रखता हूं। एक गृहस्थ होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि मेरे घर के द्वार सदैव अतिथियों के लिए खुले रहें। कौन जाने कब कोई अतिथि आ जाए? मुझे पहले से ही तैयारी रखनी होती है।”
उसने मुस्काराते हुए अपनी बात जारी रखी– “और छठवां पैसा मैं अपने लिए रखता हूं। जिससे मैं अपने रोजमर्रा के खर्च चलाता हूं।” अपनी समस्त जिज्ञासाओं का समाधान पाकर राजा भोज उस लकड़हारे से बहुत प्रसन्न हुए।
निश्चित रूप से प्रसन्नता और संतुष्टि का धनसंपदा, पद और सांसारिक वैभव से कोई लेना-देना नहीं है। वर्तमान स्थिति के प्रति आपका व्यवहार और स्वभाव ही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने को उपलब्ध साधनों के अनुरूप ही जीवनजीने की कला सीख ले, तो वह काफी कुछ प्राप्त कर सकता है। वह बुजुर्ग लकड़हारा वास्तव में राजा था क्योंकि उसका नजरिया ही राजा की तरह था!
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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