काशी सत्संग: खुशी का राज

एक शिष्य ने गुरु से पूछा- गुरुदेव, हमेशा खुश रहने का कोई उपाय हो तो बताएं। संत बोले- बिल्कुल है, आज तुमको वह राज बताता हूं। यह कह कर संत शिष्य को अपने साथ लेकर सैर पर निकल पड़े। रास्ते में वे अच्छी बातें करते रहे, शिष्य बड़ा आनंदित था।
तभी, एक स्थान पर ठहर कर संत ने शिष्य को एक बड़ा पत्थर देकर कहा- ‛इसे साथ उठाए चलो।’ अब शिष्य पत्थर को उठाकर संत के साथ-साथ चलने लगा। कुछ देर तक तो आराम से चला, लेकिन थोड़ी देर में हाथ में दर्द होने लगा, फिर भी वह दर्द सहन कर चुपचाप चलता रहा। संत पहले की तरह मधुर उपदेश देते चल रहे थे। अंततः शिष्य का धैर्य जवाब देने लगा।
शिष्य ने कहा- गुरु जी, आपके प्रवचन मुझे प्रिय नहीं लग रहे, भारी पत्थर को उठाए मेरा हाथ दर्द से फटा जा रहा है। पत्थर रखने का संकेत मिलते ही शिष्य ने पत्थर को फेंक दिया और कुछ राहत महसूस की। साथ ही आनंद में भरकर गहरी सांस लेने लगा।
संत ने कहा- यही है खुश रहने का राज! मेरे प्रवचन तुम्हें तभी आनंदित करते रहे जब तुम बोझ से मुक्त थे, परंतु पत्थर के बोझ ने उस आनंद को छीन लिया। जैसे पत्थर को ज्यादा देर उठाए रखने से दर्द बढ़ता जाएगा, उसी तरह हम दुखों या किसी की कही कड़वी बात के बोझ को जितनी देर तक उठाए रखेंगे उतना ही दुख और कष्ट होगा। अगर खुश रहना चाहते हो, तो दुख रूपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और संभव हो, तो उसे उठाओ ही नहीं।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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