काशी सत्संग: मन की सच्चाई

एक बार की बात है। दो संत जंगल में विचरते हुए, एक नदी किनारे पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि एक बहुत सुंदर लड़की चट्टान पर बैठी हुई थी! उसने कहा, “महाराज, मैं ये नदी पार करके सामने के गांव में जाना चाहती हूं, परन्तु नदी के बहाव को देखकर, इसे पार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूं। उस कन्या ने संत से प्रार्थना की और कहा, “महाराज, शाम होने को है और मुझे अपने घर पहुंचना है। आपकी बड़ी कृपा होगी, बस मुझे उस पार उतार दीजिए!”
बड़े संत ने एक पल के लिए कुछ विचार किया! उस लड़की को अपनी पीठ पर बिठाया और तैर कर नदी के पार उतार दिया! लड़की ने महाराज को प्रणाम कर विदा ली! शिष्य इस व्यव्हार को देख कर विस्मित सा हो रहा था!
तीन महीने बाद, एक दिन दोनों संत पेड़ के नीचे बैठे हुए ध्यान कर रहे थे! एकाएक शिष्य चिल्ला उठा, “बस अब और नहीं! मैं और बर्दाश नहीं कर सकता! महाराज, मुझे यकीन नहीं होता कि आपने एक संत होते हुए भी उस महिला को पीठ पर बैठा कर नदी के पार उतारा। मैंने आपको एक सच्चा संत मान कर आपकी दिन-रात सेवा की और आपने ये कर्म किया? आपने न केवल मेरा विश्वास तोड़ा है, बल्कि आपने तो उस परमात्मा को भी धोखा दिया है! आप संत नहीं हो सकते!”
अपने शिष्य के वचन सुनकर महाराज मुस्कुराने लगे। वे बोले, “बेटा, मैंने उस महिला को केवल दो मिनट में उस पार उतार दिया, क्योंकि मानव सेवा और समाज का भला ही एक संत का उदेश्य होता है। उस दिन के बाद एक पल के लिए भी वो महिला मेरे साथ नहीं रही, परन्तु तुमने हर पल उसको अपने ह्रदय में रखकर, पिछले तीन महीने उसके साथ बिताए हैं। ध्यान के समय, विचरण करते समय, भोजन करते हुए, पल-पल वो तुहारे साथ थी! वो रह रही थी उस नफरत में जो तुम्हारे मन में घर कर गयी, उसने तुम्हारी विचार करने की शक्ति पर भी अधिकार कर लिया!”
संत आगे बोले, “मनुष्य जीवन में ह्रदय ही वो स्थान है, जहां शांति और शुद्धता का वास जरूरी है। जीवन के सफर में साथ चलने वाले राहगीरों के कार्यों से हमारे मन में अशुद्धता का आगमन नहीं होना चाहिए।” गुरु की बात सुनकर शिष्य निरुत्तर हो गया।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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