काशी सत्संग: ईमान का उद्यम

सदियों पहले यूनान में हेलाक नाम का एक सेठ रहता था। उसके पुत्र का नाम ‘चालाक’ और पुत्रवधू का नाम था ‘हेली’। हेलाक की पुत्रवधू धार्मिक प्रवृत्ति की थी, लेकिन हेलाक एक कुटिल व्यक्ति था। उसकी किराने की दुकान थी, वह अपने हर ग्राहक को ठग लेता। इसीलिए लोग उसे वंचक सेठ के नाम से बुलाने लगे। वह जितना धन कमाता वह जल्द ही खर्च हो जाता था। हेलाक की पुत्रवधू हमेशा इन बुरे कर्मों को छोड़ने की सलाह देती थी, परंतु सेठ ने कभी उसकी बात नहीं मानी।
पुत्रवधू का कहना था कि जब रोटी, कपड़ा, मकान… सब कुछ है, तो हमें इस तरह से लोगों को परेशान करने की क्या जरूरत है! यह बात सेठ को अजीब लगी, लेकिन उसने सोचा एक बार पुत्रवधू की बात को परख कर देखा जाए।
उस दिन सेठ ने बिना धोखाधड़ी से कमाए धन को एक पोटली में बांधकर नदी में फेंक दिया। उसने उस पोटली में अपने घर का पता भी लिख दिया। उस पोटली को एक मगरमच्छ ने खा लिया। कुछ दिनों बाद वह मगरमच्छ एक मछुआरे के जाल में फंस गया।
जब मछुआरे ने मगरमच्छ का पेट चीरा, तो वह पोटली निकली। पोटली में सेठ का पता और थोड़ा बहुत सोना था। मछुआरा धन लेकर सेठ के घर पहुंचा, धन पाकर सेठ बहुत खुश हुआ। और उस दिन से उसने बुरे कर्मों को हमेशा के लिए छोड़ दिया।
मेहनत से कमाया धन, खो जाने के बाद भी वापस मिल जाता है और यह धन आपको तमाम तरह की समस्याओं से दूर रखता है। जबकि, गलत तरीकों से कमाए गए धन से थोड़े समय का सुख तो मिल सकता है, लेकिन वह आपको सेहत, सुख और संतुष्टि नहीं दे सकता है।
ऊं तत्सत…

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Post Author: Soni

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