काशी सत्संग: श्रीराम भक्त रावण!

राम-रावण की सेना आमने-सामने थी, लक्ष्मणजी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी।
सुलोचना ने कहाः ‘अगर यह मेरे पति की भुजा है, तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दें।’
कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी। सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती !
जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मंगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया,’देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्रीलक्ष्मण तथा स्वयं भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।’
जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहा,’ जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहां तक उचित है? यदि यह गई, तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी?’
यह सुनकर रावण बोला, ‘मंत्रियों ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गई है। अरे ! यह तो रावण का काम है, जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।’
धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र ! !! जिसकी प्रशंसा करते शत्रु भी थकता नहीं !
मित्रों, कथा की सत्यता या असत्यता के परीक्षण की जगह सार यह है कि उत्तम जीवन या चरित्र वही है, जिसे प्रमाणित न करना पड़े, बल्कि शत्रु को भी उस पर विश्वास हो। मनुष्य को सिर्फ प्रभु श्रीराम का स्मरण ही नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके दिखलाए मार्ग पर भी चलना चाहिए।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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