काशी सत्संग: काम नहीं, तो भोजन नहीं

चीनी जैन विद्या के एक प्रसिद्ध गुरू हुए हयाजूको। वे अस्सी वर्ष की उम्र में भी अपने शिष्यों के साथ कठोर श्रम करते थे जैसे – बागवानी करना, मैदान साफ करना, पेड़ों की कटाई-छटाई करना….आदि।
उनके शिष्यों को यह देखकर दु:ख होता कि उनके वृद्ध शिक्षक इतना कठिन श्रम करते हैं। वे भी यह जानते थे कि उनके गुरू उनकी यह बात कभी नहीं मानेंगे कि वे कठिन श्रम न करें। इसलिए शिष्यों ने भी एक दिन उनके औजार छुपा दिए।
औजार नहीं मिलने से गुरूजी उस दिन कोई श्रम नहीं कर पाए। उस दिन गुरूजी ने कुछ नहीं खाया। अगले दिन भी उन्होंने कुछ नहीं खाया, और उसके अगले दिन भी नहीं।
उनके शिष्यों ने आपस में चर्चा की कि गुरूजी यह जानकर बहुत क्रोधित होंगे कि हम लोगों ने उनके औजार छुपा दिए, इसलिए अच्छा होगा कि हम उनके औजार वापस रख दें।
उन्होंने ऐसा ही किया। गुरूजी ने उस दिन फिर परिश्रम किया और बाद में खाना खाया। उस शाम गुरूजी ने अपने शिष्यों को “काम नहीं, तो भोजन नहीं” विषय पर व्याख्यान दिया।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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