काशी सत्संग : परमात्मा का द्वार

एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठ कर घर छोड़ के दूर चला गया और फिर इधर-उधर यू ही भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए!
एक दिन वह बीमार पड़ गया। अपनी झोपड़ी में अकेले पड़े हुए उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई, कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर, या दुखी होने पर, उसकी सेवा किया करते थे। उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था। उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है, वो रात के अंधेरे में ही घर की ओर हो लिया।
जब घर के नजदीक गया, तो उसने देखा कि आधी रात के बाद भी उसके घर का दरवाजा खुला हुआ है। अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया, तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं। उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया, पुत्र की आंखों में आंसू आ गए!
उसने पिता से पूछा, “ये घर का दरवाजा खुला है, क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा ?” पिता ने उत्तर दिया, “अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ, जिस दिन से तू गया है, मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाए और कहीं ऐसा न हो कि दरवाजा बंद देख कर तू वापिस लौट जाए!!”
मित्रों, ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है, उसने भी प्रेमवश अपने बच्चों के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं कि पता नहीं कब भटकी हुई उनकी कोई संतान उसकी ओर लौट आए। हमें भी आवश्यकता है, तो सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी ओर बढ़ चलें। सदा स्मृति रहे कि आप एक शांत स्वरूप और प्रेम स्वरूप आत्मा हैं।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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