काशी सत्संग : धनाभाव

राजा चंद्रभान विद्वानों का बड़ा सम्मान किया करते थे। एक दिन उनकी सभा में कहीं से एक पीड़ित ब्राह्मण आया। राजा ने उसको बहुत उदास तथा चिंतित मुद्रा में देखकर कुशलता पूछी। तब ब्राह्मण ने एक श्लोक में अपना सारा दु:ख कह सुनाया। श्लोक का अर्थ इस प्रकार था – “ राजन ! मेरी मां न तो मुझसे प्रसन्न होती है और न मेरी पत्नी से और मेरी पत्नी भी न तो मुझसे प्रसन्न होती है और ना ही मेरी मां से तथा साथ ही मैं भी न तो अपनी मां से प्रसन्न रहता हूं और ना ही अपनी पत्नी से। बताइए इसमें किसका दोष है!”
महाराज समझ गए कि ब्राह्मण के घर में नित्य कलह रहती है और घर के सदस्य एक-दूसरे से अप्रसन्न रहते हैं। ऐसे में ब्राह्मण देवता दुखी रहते हैं। तब महाराज के मन में विचार आया कि अवश्य ही ब्राह्मण के घर में बड़ी गरीबी होगी। गरीबी में आपसी प्रेम,सहानुभूति बिल्कुल नहीं रह जाती और छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े होते रहते हैं और लोग एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं। यदि ब्राह्मण के घर में सब को खाने-पीने का सुख होता, तो कोई किसी से असंतुष्ट क्यों रहता। धन का अभाव ही सबकी अप्रसन्नता और विरक्ति का एकमात्र कारण है।
राजा ने रोग को ठीक से पहचानकर उसकी ठीक औषधि दे दी। उन्होंने ब्राह्मण को धन से भरी एक थैली भेंट की। धन की थैली खनखाता हुआ ब्राह्मण अपने घर लौटा। पहले जब वह बाहर से खाली हाथ आता था, तब घर में कोई उसे पूछता भी नहीं था, किंतु इस बार तो उसका घर में खूब आदर-सत्कार हुआ। उसकी पत्नी ने बड़े प्रेम से पूछा, “ कहां चले गए थे। मैं तुम्हारे मोह में व्याकुल होकर कब से तुम्हारी राह देख रही थी।”
इसके बाद ब्राह्मण देवता की मां ने अपनी बहू से कहा, “बहुरानी ! मैं पंखा हिलती हूं, तुम दौड़कर जल्दी हाथ-मुंह धोने के लिए पानी ले आओ। फिर जल्दी चूल्हा जलाकर कुछ खाने को बना दो।”
पत्नी ने भी बड़ी प्रसन्नता से कहा, “अभी पकाती हूं, मांजी।”
अपने परिवार में ब्राह्मण ने ऐसा प्रेम व्यवहार पहले कभी नहीं देखा था। उसको बड़ी प्रसन्नता हुई और मन ही मन उसने महाराज को धन्यवाद दिया। मित्रों, कई बार परिवार के सदस्यों में आपसी दूरी की जड़ में धन का अभाव या कोई अन्य समस्या होती है। मिल-जुलकर समस्याओं का निवारण करने की जुगत करनी चाहिए न कि कलह।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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