काशी सत्संग: साधू या असाधू!

एक फकीर एक शहर के बस स्टैंड के पास एक वृक्ष की छाया में माला फेर रहा था, तभी एक अंग्रेज बस से उतरा। वह बाबा के पास जाकर बोला, ‘ये आपके हाथ में क्या है?’ बाबा ने अंग्रेज के कंधे पर टँगी बन्दूक की ओर देखते हुए पूछा, ‘ये क्या है?’
अंग्रेज ने कहा,’ये मेरा हथियार है।’ बाबा बोले, ‘और मेरा हथियार है।’ अंग्रेज ने उत्सुकता वश पूछा, ‘ये आपको किसने दिया!’ तब बाबा ने भी प्रश्न किया, ‘आपको ये बन्दूक किसने दी!’
अंग्रेज बोला, ‘ मुझे मेरी सरकार ने यह दी।’ इस पर बाबा ने कहा, ‘मुझे ये मेरी सरकार ने दिया है।’ फिर बाबा ने अंग्रेज से पूछा, ‘ तुम्हारा हथियार किस काम का है?’ अंग्रेज ने ऊपर पेड़ पर बैठे पक्षी पर निशाना साधा और गोली दाग दी। पक्षी घायल होकर नीचे गिर पड़ा। अंग्रेज ने बाबा की ओर देखकर कहा, ‘ये काम करता है, मेरा हथियार।’
बाबा ने घायल पक्षी को हाथ में उठाया, उस पर कुछ जड़ी-बूटी लगाते हुए, अपनी माला को फिर और ‘राम-राम’ बोलते हुए पक्षी को आसमान की ओर उछाल दिया। पक्षी उड़ कर अपने स्थान पर बैठ गया। अब बाबा बोले, ‘मेरा हथियार यह काम करता है।’ अंग्रेज के ज्ञान चक्षु खुल गए और वह बाबा का भक्त हो गया। उसने बाबा से ‘राम’ नाम की दीक्षा ली और प्रभु श्रीराम में ही रम गया।
मित्रों, सार यह है कि जीवन लेने वाले से जीवन बचाने वाला सदैव बड़ा होता है और यही मानव धर्म है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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