काशी सत्संग : निश्छल मन

एक गांव में शिवदत्त नामक जमींदार रहता था। उसने घर का और बाग का काम करने के लिए एक नौकर रामू रखा था। जमींदार बहुत कठोर हृदय वाला दयाहीन इंसान था। एक दिन रामू देर से आया, तो जमींदार ने कहा- क्या रे, अब आया है काम पर। इस तरह देर से आएगा तो काम कौन करेगा।
रामू ने माफी मांगी, तो जमींदार ने देरी का कारण पूछा। रामू ने बताया कि उसके लड़के को बुखार था, तो उसे लेकर डॉक्टर के पास गया, इसलिए देरी हो गई। जमींदार बोला- तुम्हें ही लेकर जाना था क्या? तुम्हारी पत्नी नहीं थी घर पर? नौकर ने बताया कि उसको भी बुखार था, तब जमींदार ने कहा- ठीक है, ठीक है। चलो अब काम पे लग जाओ। अगर कल से देर से आए, तो काम पर ही मत आना।
इसके बाद रामू कहता है कि वह उसकी बगिया के पेड़-पौधों को पानी डालने जाता है, तो जमींदार डांटता है- पौधों को पानी जरूरी है या मुझे? चल जा मेरे लिए पानी ला। पेड़-पौधों में पानी मत दे, दूसरे काम निबटा, आलसी कहीं कहा! काम में लग जाता है। काम पूरा कर वह शाम को जमींदार से घर जाने की बात करता है, तो जमींदार नाराज होकर बोलता है- सुबह देर से आएगा और शाम को जल्दी जाएगा! रामू कहता है कि उसकी पत्नी और बच्चा दोनों बीमार हैं, उन्हें संभालने के लिए जाना ही होगा।
इस पर जमींदार ने कहा- उन्हें कुछ नहीं होगा। मेरे सर में दर्द हो रहा है, जाओ जंगल से जड़ी-बूटी लेकर आओ। बाहर अंधेरा हो चुका है कहने पर जमींदार नाराज होता है- क्यों रे! मुझे उल्टा जवाब दे रहा है? जो बोला है, वह कर।
डरा-सहमा रामू जंगल के लिए निकल पड़ता है। जिधर देखो सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा था, तभी उसे बाघ की दहाड़ सुनाई देती है। वह वापस भागने लगता है और एक पेड़ से टकराकर गिर पड़ता है और बेहोश हो जाता है। सुबह जब उसे होश आता है, तो उसके आस-पास सोने की मोहरें ही मोहरें होती हैं।
अभी वह सोच ही रहा होता है कि पेड़ बोल उठता है- रामू ये सोने की मोहरे मैंने तुम्हारे लिए ही दी हैं। तुम्हारी भलाई मुझे बहुत अच्छी लगी। अब तुम्हे किसी के पास जाकर काम करने की जरूरत नहीं है। रामू कहता है उसे काम तो करना है, इस पर पेड़ बोलता है- तुम्हें सिर्फ ये काम करना है कि हर रोज आकर मुझे पानी दे देना। अगर तुम मुझे हर रोज पानी दोगे, तो मैं भी तुम्हें रोज सोने की मोहरें दूंगा।
रामू कहता है कि ठीक है, वह रोज उसे ही नहीं आसपास के बाकी पेड़-पौधों को भी पानी दे दिया करूंगा। इसके बाद वह सोने की मोहरो की थैली को उठाकर जमींदार के घर के लिए निकल पड़ता है और सोचता है कि यह सब मालिक को दूंगा, तो खुश होकर मुझे इसमें से कुछ न कुछ जरूर देंगे। लेकिन वहां पहुंचने पर जमींदार गुस्से में फूट पड़ता है- क्या रे, तुझे कल रात भेजा था जंगल में, पूरी रात तेरा इंतजार करता रहा और तू आया ही नहीं! अब भाग यहां से, अंदर मत आना।
जमींदार रामू की कोई बात नहीं सुनता और उसे भगा देता है। व्यथित मन से वह घर जाता है, उसकी पत्नी हाथ में थैली देख पूछती है- इसमें क्या है जी, आप तो कभी ऐसी थैली लेकर नहीं आए? फिर राजू अपनी पत्नी को सारी बात बताता है। इसके बाद पत्नी कहती है- हम कितने भाग्यवान हैं। अब हमारे सारे कष्ट मिट जाएंगे। इसके बाद रामू रोजाना जंगल जाकर पेड़ को और आसपास पानी डालता है, बदले में सोने की मोहरे लेकर घर लौटता है।
धीरे-धीरे वह गांव में सबसे धनवान बन जाता है और लोगों की सहायता भी करता है। अब वह सबके घरों में जाकर पौधा लगाता और उनकी रखवाली भी करता, गांव वाले उसकी प्रशंसा करते है। यह बात जमींदार को भी पता चलती है। तो वह रामू से मिलने आता है और पूछता है- तू इतना धनवान कैसे बन गया? रामू ईश्वर की कृपा बताता है।
अगले दिन जमींदार उसकी पीछा करते हुए जंगल तक जाता है और देखता है कि जब रामू उस पेड़ को पानी डाल रहा होता है, तो सोने की मोहरे मिलतीं हैं। जब रामू मोहरें उठाकर जाने लगता है, तो जमींदार उससे इसका रहस्य पूछता है? रामू के बताने पर वह सोचता है कि मैं भी पानी डालकर पेड़ के नीचे बैठूंगा।
अगले दिन वह मोहरों के लालच में पेड़ को बहुत सारा पानी डालता है और नीचे ही बैठ जाता है। उसके बाद पेड़ से सांप गिरने लगते हैं। जमींदार डर जाता है और भागने लगता है। सांप उसका पीछा करते हैं, भागते-भागते वह गड्ढे में गिर जाता है। तब पेड़ कहता है- निश्छल मन से सेवा करने वालों का ही भला होता है। जो गलत विचार लेकर आता है, उसका बुरा ही होता है।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

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