काशी सत्संग: वृन्दावन के चींटे

संत एक बार वृन्दावन गए। वहां कुछ दिन घूमे, फिर दर्शन के बाद जब वापस लौटने का मन किया, तो सोचा भगवान को भोग लगा कर कुछ प्रसाद लेता चलूं। संत ने रामदाने के कुछ लड्डू खरीदकर भगवान को प्रसाद चढ़ाया और आश्रम में आकर सो गए।

अगले दिन वापसी के लिए ट्रेन से चल पड़े। वृन्दावन से चली ट्रेन शाम को मुगलसराय स्टेशन पहुंची, तब संत ने सोचा कि अभी पटना आने में कुछ समय है। भूख लग रही है सो संध्या वंदन करके कुछ खा लिया जाए। संत ने हाथ-पैर धोकर वंदना की और लड्डू खाने के लिए डिब्बा खोला। उन्होंने देखा लड्डू में चींटे लगे हुए थे। उन्होंने चींटों को हटाकर एक-दो लड्डू खा लिए। बाकी लड्डू प्रसाद बांटने के उद्देश्य से छोड़ दिए। लेकिन संत को लड्डुओं से अधिक उन चींटों की चिंता सताने लगी। सोचने लगे कि ये चींटें वृन्दावन से इस मिठाई के डिब्बे में आए हैं। बेचारे इतनी दूर तक ट्रेन में मुगलसराय तक आ गए। कितने भाग्यशाली थे इनका जन्म वृन्दावन में हुआ था, अब इतनी दूर से पता नहीं कितने दिन या कितने जन्म लग जाएंगे इनको वापस पहुंचने में! पता नहीं ब्रज की धूल इनको फिर कभी मिल भी पाएगी या नहीं ! मैंने कितना बड़ा पाप कर दिया इनका वृन्दावन छुड़वा दिया। सोचते-सोचते संत ने तय किया कि उन चींटों को वापस वृन्दावन पहुंचाना होगा और उन्होंने चींटियों को वापस उसी मिठाई के डिब्बे में सावधानी से रख लिया। वृन्दावन की ट्रेन पकड़ ली।

उसी मिठाई की दुकान के पास गए, डिब्बा जमीन पर रखा और हाथ जोड़ लिए। मेरे भाग्य में नहीं कि तेरे ब्रज में रह सकूं, तो मुझे कोई अधिकार भी नहीं कि जिसके भाग्य में ब्रज की धूल लिखी है उसे दूर कर सकूं। दुकानदार ने देखा, तो संत के पास आया और बोला- महाराज चीटें लग गए, तो कोई बात नहीं आप दूसरी मिठाई तौलवा लीजिए। संत ने कहा-भाई मिठाई में कोई कमी नहीं थी, इन हाथों से पाप होते-होते रह गया। उसी का प्रायश्चित कर रहा हूं। दुकानदार ने जब सारी बात जानी, तो उस संत के पैरों के पास बैठ गया। भावुक हो गया। इधर दुकानदार रो रहा था, उधर संत की आंखें गीली हो रही थीं!!

बात भाव की है, बात उस निर्मल मन की है, बात ब्रज की है, बात वृन्दावन की है, बात कृष्ण की है… नहीं तो बस एक कहानी।

घर से जब भी बाहर जाएं, तो घर में विराजमान अपने प्रभु से जरूर मिलकर जाएं और जब लौट कर आएं तो उनसे जरूर मिलें। क्योंकि उनको भी आपके घर लौटने का इंतजार रहता है। यह नियम बनाइए कि जब भी आप घर से बाहर निकले, तो घर में मंदिर के पास दो घड़ी खड़े रह कर कहें “प्रभु चलिए.. आपको साथ में रहना है।” ऐसा बोल कर ही घर से निकलें, क्योंकि आप भले ही “लाखों की घड़ी” हाथ में क्यों न पहने हो पर “समय” तो “प्रभु के ही हाथ” में है न।

ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

काशी पत्रिका के जरिए हमारी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता को सजोने-संवारने का सतत् प्रयास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *