काशी सत्संग: भक्त का मान

प्रभु अपने भक्त की मदद करने कब और कैसे आ जाएं, कोई नहीं कह सकता। ऐसे ही भक्त नरसी जी पर एक बार विपदा आन पड़ी। नरसी जी से नाराज होकर उनके बड़े भाई वंशीधर ने पिता के वार्षिक श्राद्ध की जिम्मेदारी उनके कंधों पर सौंप दी। दोनों भाइयों के बीच श्राद्ध को लेकर झगड़ा हो गया, यह बात नागर-मंडली को मालूम हो गया। नरसी अलग से श्राद्ध करेगा, यह सुनकर नागर मंडली ने बदला लेने की सोची।
सभी जानते थे कि नरसी का परिवार किसी तरह मांगकर खाता है, लेकिन 700 ब्राह्मणों ने श्राद्ध पर उसके यहां भोजन करने का षड्यंत्र रचा। इसका पता नरसी मेहता जी की पत्नी मानिकबाई को लग गया, वह चिंतित हो उठीं।अब दूसरे दिन नरसी जी स्नान के बाद श्राद्ध के लिए घी लेने बाज़ार गए, तब किसी ने भी उधार में घी नहीं दिया। अंत में एक दुकानदार राजी हो गया, पर शर्त रख दी कि नरसी को भजन सुनाना पड़ेगा। बस फिर क्या था, मन पसंद काम और उसके बदले घी मिलेगा, ये तो आनंद हो गया। अब नरसी जी भगवान का भजन सुनाने में इतने तल्लीन हो गए कि ध्यान ही नहीं रहा कि घर में श्राद्ध है।
अब नरसी मेहता जी गाते गए भजन, उधर नरसी के रूप में भगवान कृष्ण श्राद्ध कराते रहे। यानी की दुकानदार के यहां नरसी जी भजन गा रहे हैं और वहां श्राद्ध कृष्ण भगवान नरसी जी के वेष में करवा रहे हैं।
वो कहते हैं न :अपना मान भले टल जाए, भक्त का मान न टलते देखा।
प्रबल प्रेम के पाले पड़ कर, प्रभु को नियम बदलते देखा,
अपना मान भले टल जाए, भक्त मान नहीं टलते देखा।
उधर, महाराज सात सौ ब्राह्मणों ने छककर भोजन किया, दक्षिणा में एक-एक अशर्फी भी प्राप्त की। 700 ब्राह्मण आए तो थे नरसी जी का अपमान करने और बदले में सुस्वादु भोजन और अशर्फी दक्षिणा के रूप में पाकर साधुवाद देते चले गए।
इधर दिन ढले घी लेकर नरसी जी जब घर आए, तो देखा कि मानिकबाई भोजन कर रही है। नरसी जी को इस बात का क्षोभ हुआ कि श्राद्ध से पत्नी भोजन करने बैठ गयी। नरसी जी ने उन्हें टोका और क्रोध में बोले कि आने में जरा देर हो गयी। क्या करता, कोई उधार का घी भी नहीं दे रहा था, मगर तुम श्राद्ध के पहले ही भोजन क्यों कर रही हो?
मानिकबाई जी ने कहा, आपको क्या हो गया, आपने स्वयं खड़े होकर श्राद्ध का सारा कार्य किया। ब्राह्मणों को भोजन करवाया, दक्षिणा भी दी। और आपने ही तो कहा था कि सब विदा हो गए, अब तुम भी खाना खा लो।’ ये बात सुनते ही नरसी जी समझ गए कि उनके इष्ट स्वयं उनका मान रख गए। गरीब के मान को, भक्त की लाज को परम प्रेमी करूणामय भगवान ने बचा ली।
ऊं तत्सत…

Post Author: Soni

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