काशी संगत साधु की…

बातें जब ज्ञान या ध्यान की हों, अध्यात्म या दर्शन की हों, धर्म या पौराणिकता की हों, जीवन-मृत्यु या मोक्ष की हों तो एक ही नाम युग-युगांतर से शाश्वत है। वह है “काशी”। अपने आपमें पूर्ण और प्रामाणिक। बाबा विश्वनाथ की इस नगरी को किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं, यह तो लोगों को सर्टिफाई करती है कि वह कितने चेतनाशून्य हैं।

बात उस रात की है, जब अखबारी कामकाज निबटा यह अनपढ़ थकेमन बाहर निकला। इस बार कोई साथी नहीं था, जो गपियाते रहगुजर बन जाए। बौद्धिक समाज में जीते-जीते मानो जिंदगी भी औपचारिक हो गई थी। “कैसी बोरिंग, सपाट सी घुटती और जबरन मुस्कुराती दुनिया हो गई है हमारी..”, यही सोचते जाने कब मोटरसाइकल की हैंडिल घर की बजाय घाट की तरफ मुड़ गई। जब गोदौलिया चौराहा पीछे छूटा और सामने दशाश्वमेध घाट दिखा, तो भान हुआ कि बेवक्त कहीं और आ गए।

खैर, सोचा जब आ ही गए तो इस एकांत का कुछ लाभ उठा लें। सड़क किनारे मोटरसाइकल खड़ी की, सामने एक चायवाले से पूछा- “भइया चाय मिली का?” बिना मेरी तरफ देखे जवाब आया- “मालिक दू बजत हव, दुकान बढ़ावत हई।” उदासीन हो बढ़ने की सोचा, तब तक चुक्कड़ (मिट्टी के कुल्हड़ का सबसे छोटा भाई) में चाय लिए दुकानदार आ गया- “ई ला, अपने बदे बनइले रहली, तोहरे किस्मत में भी रहल”।
आल्हादित हो मैंने चाय सुड़की (पी) और मंद गति से पांव नापते गंगा घाट की सीढ़ियों पर जा बैठा। शांतचित्त हो अंधेरे में दूर तक नजर दौड़ाई, लौटकर खुद पर ही केंद्रित हो गया। अपने ही विचारों में घुमड़ने लगा, तभी एक प्रौढ़ आवाज ने दस्तक दी- “का बच्ची, अन्हारे (अंधेरे) में का तजबीजत (खंगाल) हउए?” पलटा, तो चेहरा स्पष्ट नहीं हुआ, पर आवाज और अंदाज मातृत्व घुला था। अनायास मुंह से निकला, “अम्मा, काम से खाली भए, त सोचे तई एहि ठीयन बइठ लेइ”।

लगे हाथ पूछ डाला, “तोहार नाव का हव अम्मा?” जवाब मिला, “काशी”। थोड़ा चौंका, “ई त बनारस क नाम हव”। अम्मा मुस्कुराईं और बोलीं, “इहे समझ ले बच्ची। हमहु दिन भर क थकल रहली, त सोचे गंगा मइया के बगले बइठ के तई सुस्ता लेई।” बातचीत को आगे बढ़ाते मेरा अगला सवाल, “कब से हउ इहां, हिंदी/अंग्रेजी भी जानैलू?”
अम्मा खिलखिलाईं और बोलीं, “बेटा, मैं लोगों से नहीं, लोग मुझसे भाषा सीखते हैं। यहां विश्व भर के विविध भाषा, संस्कृति के लोग आते हैं और खुद के सुख-दुख बांटते हैं। धर्म, काम, मोक्ष की बातें करते हैं और मैं उनकी ही भाषा/शैली/संस्कृति में उन्हें संतुष्ट करती हूं।” एक लंबी सांस लेकर वह बोलीं, “वक्त के साथ वंश बदलते गए और जमाने के साथ पीढ़ियां, नहीं बदली तो काशी और गंगाघाट की सीढ़ियां। देवाधिदेव महादेव शिव तो यहीं के थे, उनके पीछे समूचा देवलोक, ऋषि, महर्षि, तपस्वी, ज्ञानी-अज्ञानी, सत्य-असत्य, घोरी-अघोरी, पाप-पुण्य, जीवन-मृत्यु-मोक्ष, स्वर्ग-नर्क आदि सब यहां आकर बस गए।”

मैं जैसे जड़वत उनकी बातों का हिस्सा था, वह निश्छल-निरंकार बोले जा रहीं थीं, “कहते हैं- रांड़, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी, इनसे बचे तो सेवे काशी। अरे! काशी में रहने की कोई शर्त थोड़े ही है, सृष्टि के आरंभ से आज तक जाने कितने आए, कितने गए। सभी ने भोलेबाबा की इस नगरी को अपने चश्मे से निहारा, बताया, समझाया, लिखा और जाने क्या-क्या किया। लेकिन काशी तो जस की तस ही रही। इसने कहां कभी जताया कि यहां घर-घर शिव हैं और पग-पग शिवालय। सब कहते हैं, यहीं मोक्ष है। अरे! काशी तो कहती है, जहां मुक्त हो जाओ वहीं मोक्ष है।”
कुछ पल की शून्यता और वह फिर बोलीं, “रोज सुनती हूं कि समय बदल गया है, दुनिया बदल गई है, लोग बदल गए हैं आदि। मुझे तो कुछ बदला नजर नहीं आता, युगों-युगों से लोग यहां पाप धोने और पुण्य कमाने आते रहे हैं। गंगा में डुबकी लगाने वाली हर बंद आखों में श्रद्धा ही होती है, मंदिर के घंटों की ध्वनि में लिपटी शिव स्तुति होती है। मर्णकर्णिका या हरिश्चंद्र घाट पर अपनों के बिछोह का वहीं रुदन या पितरों के लिए वहीं श्रद्धा देखती हूं, जो युगों पहले हुआ करती थी। यहां तो मृत्यु भी उत्सव है और यही साधुत्व है।”

मैं उनकी बातों में मग्न था और वह अपने विचारों से साक्षात, श्वांस विराम लेते हुए वह चेतीं- “बेटा, भोर हो गई। यह तो कालखंड है, जो अनवरत ही रहेगा। मौजूदा चक्र पूरा हुआ। हमारी चर्चा ही हमारा पोषण है। कल फिर कोई नया मिलेगा “काशी” को सुनने वाला।”
मैं मानो चेतनाशून्य सा था कि पीछे मंदिर का घंटा बजा, संज्ञान में आया कि सामने अम्मा नहीं हैं। इधर-उधर नजरें दौड़ाईं, तो गली के मोड़ पर एक धुंधली सी परछाई महसूस हुई। दौड़ा, मगर देर हो चुकी थी। फिर, ठिठका और घड़ी पर नजर डाली, भोर के साढ़े चार बज रहे थे। सड़क पर आया, मोटरसाइकल स्टार्ट की और चल पड़ा धीमी रफ्तार में विचारते हुए- “वाह रे काशी नगरी, यह तू ही है। इतनी निर्मल, इतनी सहनशील, इतनी उत्सवी, इतनी साध्वी, इतनी दात्रि.. और जाने क्या-क्या..।

“जाने कितनी उम्र गुजारी सोए-सोए,
आंख खुली तो खुद को पाए अर्थी पर”
■ कृष्णस्वरूप

Post Author: kashipatrika

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