Kashi Moksh nahi deti_KashiPatrika

धर्म क्षेत्र: काशी ‘मोक्ष’ नहीं देती

 

राहुल, मोदी, योगी, गंगा, एएमयू, बीएचयू.. और जाने क्या-क्या..!! देश-दुनिया की राजनीति और कचर-पचर से त्रस्त मन कब चौक की गलियों से पग-पग डोलते मणिकर्णिका की ओर बढ़ चला, इसका भान ही नहीं हुआ। नीचे की ओर लुढ़कती पतली गली से जा पहुंचे घाट की सीढ़ियों पर। “केहू आवत हव का” (कोई आ रहा है क्या) के वाक्य से तन्द्रा टूटी और प्रश्नवाचक चेहरे का आशय समझ ‘ना’ में मुंडी (सिर) हिलाया, फिर जा बैठा एक किनारे। पीछे दो वयस्क बातचीत, “गुरु! धंधा कमजोर है, सीजन आए तो बात बने।” जवाब में, “15 दिन अउर, गर्मी के साथे लाशौ बढ़ी” (15 दिन और, गर्मी के साथ लाश भी बढ़ेंगी)। बातें सुन अनपढ़ मन बुदबुदाया, “यही काशी मोक्ष देती है!” वे पलटे और बोले, “भइया, काशी मोक्ष नहीं देती, मोक्ष तो आपको अपने आप से पाना है, तभी बाबा (विश्वनाथजी) और मइया (मां गंगा) आपको मुक्ति दे पाएंगे।” बुदबुदाहट तेज थी, जिसका प्रतिउत्तर मिला और मैं मुस्कुरा दिया। 

अब हम तीन हो चुके थे, समक्ष दोनों वयस्क संभवतः मणिकर्णिका (डोम परिवार) के ही निवासी थे। सत्संग रूपी शास्त्रार्थ के हम तीनों ही साक्षी थे और सहभागी भी। उनमें एक बोला, यह तो अंतरात्मा की पुकार है, ‘जिन ढूंढा तिन पाईंया, गहरे पानी पैठ’। काशी ने कब कहा कि वह मोक्ष देती है! यह तो आप पर है, इसे मृत्यु मानिए या मोक्ष। मुझ अनपढ़ की मुस्कुराहट में छिपे व्यंग्य को ताड़ दूसरे का प्रश्न, “घाट घूमने आए हैं?” मुझसे अनायास सच निकल गया, “खबरों की दुनिया में सिर्फ बकवास राजनीति, हिंदू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, भारत-पाक-चीन, गांधी-जिन्ना-मोदी-राहुल.. आदि सुन-सुन कर पक गया और शून्य की हालत में यहां आया, तो लाशों पर धंधे की बात सुन थोड़ा कुढ़ गया”। 
 
मृत्यु या मोक्ष, सब यहीं है 

बिना लाग-लपेट का जवाब पाकर मानो वह सन्तुष्ट हुए, “यह सच है कि हम शवों के धंधे में हैं, लेकिन यह शाश्वत है कि हम जीवित का धंधा नहीं करते। जीवित लोगों का धंधा करने वाले तो ऐसे हैं कि आप भी ऊब कर इन मुर्दों के बीच आ बैठे”। यह लाजवाब वाक्य खुद में इतना ज्ञान समेटे था कि मैं निर्मूढ हो गया। लगभग सांत्वना देते बोले, “काशी कालजयी है, इसका हम सभी उदाहरण हैं। कितनों ने जन्म लिया, पुण्य-पाप किया और विदा हो लिए। पूर्वज-दर-पूर्वज एक-दूसरे को तरते-तारते गए। वर्तमान आप और हम हैं। जिनकी चर्चा में लोग धरती-आकाश एक किए हैं, वह भी उसी गति को प्राप्त होंगे, जिसे हम और आप। मृत्यु या मोक्ष, सब यहीं है”। मेरा प्रश्न, “आप लोग गर्मी, लाशों की बात कर रहे थे?” प्रतिउत्तर, “पूर्वजों का तो पता नहीं, आजकल इसे सीजन कहते हैं। ज्यादा गर्मी, ज्यादा ठंड में मौतों की संख्या भी बढ़ जाती है और यहां आने वाले शवों की भी! आखिर, हमारी रोजी-रोटी तो यही है।” इस तरह ज्ञानार्जन होता गया।

उन्मुक्त है मणिकर्णिका
मान्यता है कि मणिकर्णिका की चिता पर लेटने वाले को सीधे मोक्ष मिलता है। इसी घाट पर चिताओं की भस्म से होली खेली जाती है, तो यहीं चैत्र नवरात्र की सप्तमी पर नगरवधुएं जलती चिताओं के बीच नृत्य करती हैं। कहते हैं यही मोक्ष की थाती है, आदि-अनादि काल से यहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं हुई। पिछले कुछ वर्षों में देखें, तो यहां औसतन रोजाना 300 शवों का अंतिम संस्कार होता है।
शव से भी ‘कर’ वसूली
संभवतः यह दुनिया का इकलौता श्मशान है, जहां हर मुर्दे को चिता पर लिटाने से पहले बाकायदा कर (टैक्स) वसूला जाता है। मान्यता है कि श्मशान के रख-रखाव का जिम्मा डोम जाति को सौंपा गया, तब उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं था। दाह संस्कार में मिला दान ही उनका जीविकोपार्जन था, वहीं परंपरा अनवरत है। राजा हरीशचंद्र ने एक वचन के तहत राजपाट छोड़ कर डोम परिवार के पूर्वज कल्लू डोम के यहां नौकरी की थी। इसी बीच उनके बेटे की मौत हो गई और बिना दान दिए अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं थी। लिहाजा उन्हें पत्नी की साड़ी का एक टुकड़ा बतौर दक्षिणा डोम को देना पड़ा। तभी से शवदाह के बदले ‘कर’ की परंपरा और मजबूत हो गई।
 
रूप बदलती परंपरा 
समय के साथ दान-दक्षिणा की परंपरा ‘कर का रूप लेते हुए लालच की चादर ओढ़े वसूली के धंधे में बदल गई। अब यहां आने वाली हर शवयात्रा पर हैसियत का आंकलन कर वसूली होती है। डोम परिवार का कहना है कि दशकों पहले तक अंतिम संस्कार के बदले राजे-रजवाड़े जमीन-जायदाद, सोना-चांदी तक देते थे। अब तो तयशुदा रकम के लिए भी तमाम झक-झक करनी पड़ती है।
 
मिलता है मृत्यु प्रमाण-पत्र 
परंपरा में अंतिम संस्कार के लिए सिर्फ ‘कर’ लेना ही शामिल नहीं है, बदले में मृत्यु प्रमाण-पत्र भी मिलता है। डोम राजा द्वारा हस्ताक्षरित यह प्रमाण-पत्र नगर निगम में भी मान्य है, जिसके आधार पर सरकारी दस्तावेज तक आगे बढ़ाए जाते हैं। हालांकि, इसके लिए बाकायदा कुछ दिशा-निर्देश भी बनाए गए हैं, जिसका पालन अनिवार्य है।
डोम राजा की सवारी

परंपराओं की जननी काशी का महात्म्य यहीं तक सीमित नहीं है, डोम राजा की सवारी भी इसकी एक कड़ी है। देर शाम निकलने वाली यह सवारी आगंतुकों के लिए किसी कौतूहल से कम नहीं। भव्य रथ और चांदी का सिंहासन, उस पर तेल में लगभग नहाए और मस्तक पर लंबा काला टीका लगाकर विराजे श्यामल डोम राजा के दर्शन मानो साक्षात यमराज से रूबरू करा रहे हों।

 
यहां उत्सव है मृत्यु 
बहुतों के मुंह से सुना होगा, ‘काशी में उत्सव है मृत्यु’। आभास यूं कि ‘राम नाम सत्य है’ की प्रतिध्वनि लिए तमाम शव यहां लाए जाते हैं। गलियों-नुक्कड़ों, दुकानों-घरों में मौजूद लोगों के लिए यह सामान्य है। अंतिम संस्कार की सामग्री देने वाले से लेकर कर्मकांड कराने वाले तक, दुकानदारों से लेकर नाई-डोम सभी अपनी दैनिक चर्या के साथ इन सबमें सहभागी होते हैं। एक के पीछे एक शव हैं, लेकिन चाय-नाश्ता-खाना-पीना सबकुछ वैसे ही है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। अंतिम संस्कार के बाद मिष्ठान वितरण न करने वालों की भद्द पिटती है, तो मिठाई न खाने वाले नर्क के भागी माने जाते हैं।
कमाल है काशी 
उन लोगों की बातों में ऐसा खोया कि मन-मष्तिष्क का बेवजह बोझ कब तिक्त हो गया, पता ही न चला। दोपहर से शाम हो गई, उनकी ही बातों में दुनिया तमाम हो गई। जिंदगी की रेस में हम आत्मिक शांति के लिए मनोचिकित्सक तक जा पहुंचते हैं, लेकिन थोड़ा वक्त चुराकर खुद से साक्षात नहीं हो पाते। काशी कुछ न कहते हुए जाने कितने ‘पगलों’ को ज्ञानभरा सुकून दे डालती है। यही है काशी की खासियत, जो उसे विश्व से विरक्त किए हुए है। उनका कहना शायद सच ही था, “काशी मोक्ष नहीं देती। मोक्ष तो हमें खुद से पाना है। जब तक हम अपनी आसक्तियों से मुक्त नहीं होंगे, तब काशी हमें कैसे मुक्ति दे पाएगी?”
 कृष्णस्वरूप 

Post Author: KrishnaSwarup

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