काशी में ‛शिव’ की होली

भस्म और ‛गुलाल में सराबोर होंगे विश्वनाथ

खान-पान, वार-त्यौहार…हर बात में जगत से भिन्न शिव की नगरी ‛काशी’ की ‛होली’ भी कुछ हटके ही है। रंगभरी एकादशी पर गौरी-शिव संग जमकर होली खेलने के बाद ही काशी में होली का हुड़दंग शुरू होता है। इतना ही नहीं रंगभरी एकादशी के ठीक दूसरे दिन बाबा भोलेनाथ भूत-प्रेतों के साथ श्मशान में भस्म से होली खेलते हैं…

फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे वैष्ण‍वों में आमलकी एकादशी भी कहते हैं, इसी दिन शिव नगरी काशी में रंगभरी एकादशी मनायी जाती है। 354 वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार इसी दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गौना कराकर काशी लाए थे।
इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और वह सपरिवार पालकी पर नगरवासियों के साथ होली खेलने निकलते हैं।

भक्तों संग रंग खेलते हैं भोलेभंडारी
वैसे तो, शिव-पार्वती विवाह यानी शिवरात्रि से ही काशी में रंगों की छठा शुरू हो जाती है, लेकिन रंगभरी एकादशी पर स्वयं भोलेनाथ अपने भक्तों के साथ होली खेलते हैं। इस दिन बाबा की चल प्रतिमा अपने परिवार के साथ अपने नगर के भ्रमण पर निकलती है। ऐसी मान्यता है कि
रंगभरी एकदशी के पावन दिन देवलोक के सारे देवी-देवता स्वर्गलोक से बाबा के ऊपर गुलाल डालते हैं। इस पावन दिन भक्तों का सैलाब बाबा के दर्शन को उमड़ता है।

चिता के भस्म से होली
काशी दुनिया की एकमात्र ऐसी नगरी है, जहां मृत्यु को भी मंगल माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन भोलेनाथ देवगण और भक्तों के साथ तो होली खेलते हैं। लेकिन भूत-प्रेत, पिशाच आदि जीव-जंतु उनके साथ रंग नहीं खेल पाते हैं। इसीलिए अगले दिन बाबा मणिकर्णिका तीर्थ पर स्नान करने आते हैं और अपने गणों के साथ चिता के भस्म से होली खेलते हैं।

नेहरू और बाबा के खादी का इतिहास
सन 1934 में देश में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही खादी का अभियान भी चरम पर था। उस समय रंगभरी एकादशी पर पं. जवाहरलाल नेहरू की माता स्वरूप रानी, बाबा काशी विश्वनाथ का दर्शन करने आई थीं। बाबा के दरबार में उन्होंने देवाधिदेव महादेव की रजत प्रतिमा को खादी पहनाने की इच्छा महंत परिवार के सामने रखी थी। आगंतुक पंजिका का तब प्रचलन नहीं हुआ करता था, ऐसे में उन्होंने जाते-जाते एक पत्र तत्कालीन महंत पं. महाबीर प्रसाद तिवारी को दिया था। तब से बाबा को एकादशी पर खादी का वस्त्र धारणा कराया जाता है।

गुजरात से बने खादी वस्त्र व राजस्थानी पगड़ी पहनेंगे बाबा
इस वर्ष रंगभरी एकादशी पर बाबा राजस्थानी पगड़ी व गुजरात से आई खादी के कपड़ों से बने परिधान पहनेंगे, जबकि माता पार्वती को केशरिया रंग की बनारसी साड़ी से सजाएगा। खास बात यह है कि हर साल इस्तेमाल होने वाले गुलाल की जगह इस बार मथुरा से मंगाया गया हर्बल अबीर बाबा को अर्पित की जाएगी।

ये है मुहर्त
इस वर्ष 16 मार्च को एकादशी सायं 6 बजकर 42 मिनट से लगकर रविवार 17 मार्च को शाम 4 बजकर 28 मिनट तक रहेगी। अतः उदयीमान तिथि 17 मार्च को होने के कारण इसी तारीख को रंगभरी एकादशी मनाई जाएगी और इसी के साथ काशीवासियों पर भी फागुन का रंग चढ़ जाएगा।

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Post Author: kashipatrika

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