काशी के घाट

काशी में उत्तरवाहिनी माँ गंगा की जितनी श्रद्धा है, उतना ही महत्व यहाँ गंगा के किनारे पर बने पक्के घाटों का है। कहते हैं मनुष्य की 84 हजार योनियों को प्रदर्शित करते ये घाट भी मूलतः 84 ही हैं। वैसे तो प्रत्येक घाट की अपनी धार्मिक महत्ता है, पर इनमें से पौराणिकता के आधार पर कुछ घाटों का महत्व दूसरे घाटों की तुलना में अधिक है, जैसे दशास्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, पंचगंगा घाट, केदार घाट, हरिश्चंद्र और अस्सी घाट। इन घाटों से जुड़ी कई किम्वदन्तिया भी प्रचलित हैं। माना जाता हैं कि दशास्वमेध घाट पर स्वयं ब्रह्मा ने दस अश्वमेघ यज्ञ किए थे, तो इसका नाम दशास्वमेध पड़ा और मणिकर्णिका घाट का इतिहास भगवान विष्णु से जुड़ा है।

 

काशी के घाट सदियों से साधु-महात्माओं को भी आकर्षित करते आए हैं। इन सिद्ध पुरषों के आश्रम आज भी घाटों पर स्थित हैं और साधना के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रचलित हैं। इन केंद्रों पर स्थित मंदिर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने इनसे सम्बद्ध आश्रम और यह बड़ी संख्या में प्रतिदिन श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं।

 

सूर्योदय के समय इन घाटों पर बड़ी संख्या में नगरवासी स्नान-ध्यान करते हैं और माँ गंगा को साक्षी मानकर अपनी दिनचर्या आरम्भ करते हैं। प्रातः की पहली किरण पर जगमगाते इन घाटों पर बने मंदिरों की शोभा और यहाँ की जीवंतता आने वाले सैलानियों को मंत्रमुग्द्ध कर देते हैं। काशी में माँ गंगा में नौकाविहार का सबसे उपयुक्त समय सूर्योदय ही हैं। सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय काशी के घाटों का नजारा देखते ही बनता है, जहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु माँ गंगा में डुबकी लगाते हैं और पापों से मुक्ति की कामना करते हैं।

 

संध्याकाल में घाट एक बार पुनः प्रकाशित हो जाते हैं, जब विभिन्न घाटों पर माँ गंगा की आरती की जाती है। नगरवासियों के साथ, दूसरे जगहों से आए श्रद्धालु भी इस आरती में बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। घंट-घड़ियाल की ध्वनि के साथ की जाने वाली इस आरती की भव्यता अत्यंत मनोहर होती हैं।

 

निःसंदेह काशी के घाट भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूर्त उदाहरण हैं, जो सदियों से इसका प्रतिनिधित्व करते हैं।

Post Author: kashipatrika

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