“इश्क-ए-बनारस, पाक-ए-रमजान”

घुमड़ती गलियों में कदम-दर-कदम चला जा रहा था अनपढ़ मन खुद से सवाल-जवाब करते कि बनारस न होता, तो क्या होता? खुद का ही जवाब, ‘बनारस है, तो बनारसी हैं, मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे हैं, धर्म से प्रेम और मजहब से मुहब्बत है, घण्ट-घड़ियाल-अजान और गुरुबाणी है। उधेड़बुन चल ही रही थी कि अनजाने में धक्का लगा और तुरत-जवाबी भी, ‘मुआफी भाईजान, नमाज को देर हो रही है’। पलक झपकते याद आया, यह तो रमजान है। मन तो जैसे चुंबक बन हो लिया रमजान से मिलने।
गली-दर-गली भटकते आ गए सड़क पर। बड़ी मस्जिद के सामने सैकड़ों भाई बैठे थे तीसरे पहर की नमाज अता करने। नमाज की प्रक्रिया शुरू हुई और यह अनपढ़ बुत बना समझने की कोशिश करने लगा। सभी ने जैसे ही आंखें बंदकर ऊपरवाले की नुमाइंदगी की, इधर भी खुद-ब-खुद पलकें बंद हुईं। महसूस हुआ, जैसे खुद परवरदिगार दिल की धड़कनें गिन रहा हो। सांसों के उतार-चढ़ाव में ऊपरवाले से क्या-क्या दुआख्वानी की, यह भी समझ से परे था। इस बीच मगरिब की नमाज से लेकर चांद की तस्दीक और तरावीह की नमाज का एहतेमाम तक सबकुछ घड़ी की सुइयों की तरह बंद पलकों में दिखने लगा। शायद यह इबादत की मशगूलियत ही थी, जिसने कहा कि “यही है, इश्क-ए-बनारस और पाक-ए-रमजान”।

बरकत और रहमत का महीना
कहते हैं काशी में कोई भूखा नहीं सोता, इसकी दुआ इस्लाम में भी की गई है कि, “या अल्लाह! दुनिया का कोई गरीब भूखा न सोए, न कोई बदन ढंकने से वंचित होए। मुफलिसी कितनी भी हो, कभी इंसानियत न खोए।”
हजरत अली (र.अ) ने कहा, “मुझे इबादत में दो चीजें बहुत पसंद हैं- सर्द मौसम में फजर की नमाज और गर्म मौसम में रमजान के रोजे।” कहते हैं कि जब रमजान में तरावीह की नमाज पढ़ते हैं, तो फरिश्ते चारों तरफ जमा हो जाते हैं और नमाजी की रूह से निकली पाक अकीदत सीधे अल्लाह तक पहुंचती है।
बनारसी रोजेदारों के पाकीजगी भरे लफ्ज कि अल्लाह तेरा शुक्र है, तूने एक बार फिर हमें रमजान नसीब किया। माहे रमजान के शागिर्द हैं रोजेदार, तो उस्ताद है पाकीजगी, सब्र की स्लेट पर रहम का लफ्ज है रोजा। दुनिया जिस भूख-प्यास से डरती है, इस्लाम ने उसे इबादत बना दिया।

यहीं काशी, यहीं काबा
बनारस और इस्लाम का अरसा पुराना नाता है। पैगंबर हजरत मोहम्मद और मक्का का वही रिश्ता है, जो बाबा विश्वनाथ और काशी का। मक्का-भारत का व्यापारिक रिश्ता भी सदियों से है, जिसमें मसाले का तड़का और तलवार की धार मुख्य भूमिका निभाई है। कहते हैं एक बार मोहम्मद साहब ने अपनी अंगुलियों से चंद्रमा को बांट दिया, जिसका जिक्र तत्कालीन भारतीय राजा मालीबार ने अपने रोजनामचे में किया और मोहम्मद साहब से मिलने मक्का चले। किन्हीं कारणों से उन्हें रास्ते से ही में लौटना पड़ा और उनकी मौत हो गई। बाद में कुछ लोग रोजनामचे के साथ मोहम्मद साहब से मिले और भारत में इस्लाम की आमद हुई।

केरल से काशी तक
माना जाता है कि केरल में हिंदुस्तान की पहली मस्जिद बनी। सन 712 ई0 में मोहम्मद बिन कासिम, फिर 1001 से 1026 तक महमूद गजनवी के दौर में यहां इस्लाम फला-फूला। गजनवी के भांजे सैयद सालार मसूद गाजी के निर्देश पर एक काफिला सन् 1022 में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए सूफी संत मलिक अफजल अल्वी के नेतृत्व में काशी आया। सालार के नाम पर सालारपुरा और अल्वी के नाम से अलईपुरा मोहल्ला बसा। दोनों ही जगहों पर दोनों महानुभावों के मकबरे भी हैं, जो यहीं के होकर रह गए थे। काफिले में सिराजुद्दीन कलची, मलिक मोहम्मद बाकिम, जलालुद्दीन आदि कई महानुभाव थे, जिन्होंने यहां औरंगाबाद, मदनपुरा, लल्लापुरा आदि में इस्लाम को बढ़ाया, इसलिए ये मोहल्ले खास हैं।

इतिहास का आईना ‘मस्जिदें’
बनारस यूं ही गंगा-जमुनी तहजीब वाला नहीं बना, यहां की तमाम धरोहरें इतिहास का आईना हैं। इसमें मंदिरों के साथ मस्जिदें भी शुमार हैं। आदमपुर क्षेत्र में सन 1119 में ढाई कंगूरे की मस्जिद बनी, जो संभवतः बनारस की पहली मस्जिद हैै। कहते हैं 86 पिलर्स वाली यह मस्जिद जिन्नातों ने ढाई दिन में बनाई थी।
इसी तरह बांसफाटक में सन 1137 में शहाबुद्धीन ने मस्जिद बनवाई, जिसकी खासियत पठानी शैली वाली दीवारें हैं। सन 1326 में जिया अहमद ने बकरिया कुण्ड की मस्जिद बनवाई, जो मौलवी फकरुद्दीन की दरगाह के पास है। भव्यता की प्रतीक रही पंच गंगा घाट पर स्थित आलमगीर की मस्जिद 1626 में बनी थी। कहते हैं इसकी 300 फीट से ऊंची दो मीनारें कई किलोमीटर दूर से नजर आती थीं, जो कालांतर में क्षतिग्रस्त हो गंगा में समा गईं। ऐसे ही लाट भैरव की मस्जिद, चौखंभा की मस्जिद, मच्छोदरी, जैतपुरा, नई सड़क, लंका आदि की मस्जिदें अपने आप में तमाम इतिहास समेटे हुए हैं।

वक्त बदला, अकीदत नहीं
यह बनारस ही है, जिसकी पाकीजगी आज भी वैसी ही है, जैसी सैकड़ों साल पहले रही होगी। इसकी रहनुमाई अबद (अंनतकाल) है, जो इबादत की मुरीद है। यहां पैगंबर भी उतने ही मौजूं हैं, जितने शिव। वक्त चाहे जितने अरसे आगे निकल आया हो, अकीदत वही है। बनारसियों की इबादत का अंदाज-ए-बयां भी वही है, जिसमें रूह को ऊपर और जुबान को नीचे रखा गया है। शायद ऊपरवाले को भी अकीदत की यही नुमाइंदगी पसंद है, तभी यह शहर जिंदा है और यहां के लोग जिंदादिल।
■ कृष्णस्वरूप

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Post Author: kashipatrika

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