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लग्जरी से दूर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

भारत के 14वें राष्ट्रपति के रूप में नियुक्त रामनाथ कोविंद ने अपने करीब सवा साल के कार्यकाल में राष्ट्रपति के तौर पर लग्जरियों को लेने से मना कर दिया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आज अपना 73वां जन्मदिन मना रहे हैं। 1 अक्टूबर 1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में एक गरीब परिवार में जन्में कोविंद की शिक्षा-दीक्षा कानपुर में ही हुई। पेशे से वकील कोविंद ने वकालत के दौरान दबे-कुचले समाज के लिए लगातार काम किया। उन्होंने अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं के लिए आगे बढ़कर काम किया। इस दौरान उनको गरीब व नीची जातियों के बिना शुल्क कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए जाना जाता था। यही वहज रही कि साल 1994 में उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद के तौर पर चुन लिया गया। लेकिन यहां आने के बाद उन्होंने अपनी सक्रियता को और बढ़ा दिया। वे राज्यसभा के हाउस कमेटी के चेयरमैन भी रहे। वे दो बार राज्यसभा सांसद रहने के बाद बिहार के राज्यपाल बने, जबकि 25 जुलाई 2017 को उन्हें भारत का 14वां राष्ट्रपति चुन लिया गया।

गरीबों की ‛आंख’ गोविंदप्पा वेंकटस्वामी

100वीं सालगिरह पर गूगल ने बनाया डूडल

तमिलनाडु के वडामलप्पुरम में 1 अक्टूबर 1918 को जन्मे भारत के विख्यात नेत्र-सर्जन डॉ. गोविंदप्पा वेंकटस्वामी का आज 100वां जन्मदिन है। इस अवसर पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया है। डॉ. वेंकटस्वामी को उनके कलीग्स और पेशेंट्स डॉ. वी कहकर बुलाते थे। डॉ. वी ने अपना सारा जीवन जरूरतमंदों की आंखों को रोशन करने में समर्पित कर दिया था। उन्होंने 13 बेड फेसिलिटी के साथ अरविंद आई हॉस्पिटल की स्थापना की। सेहत संबंधी समस्याओं से परेशान होने के बावजूद उन्होंने अंधेपन की प्रमुख वजह मोतियाबिंद के इलाज के लिए सर्जरी करना सीखा। डॉ. वी एक दिन में तकरीबन 100 सर्जरी करते थे। उन्होंने ग्रामीण समुदायों में नेत्र शिविर स्थापित किए। अंधेपन से ग्रस्त लोगों के लिए रिहैब सेंटर बनाए और ऑफ्थैल्मिक असिस्टैंट्स के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए। उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर तकरीबन 100,000 आंखों की सफल सर्जरी को अंजाम दिया था।

जिसे नेहरू के खिलाफ शेर लिखने पर मिली जेल

“मैं अकेला ही चला था…कारवां बनता गया… ” इन मशहूर पंक्तियों के लेखक मजरूह सुल्तानपुरी ने हिंदी फिल्मों के लिए तकरीबन 4000 गीत लिखे हैं। 1 अक्टूबर 1919 में उत्तर प्रदेश के निजामाबाद में जन्में मजरूह सुल्तानपुरी ने एक शाम जब मजदूरों की एक सभा के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू पर एक शेर सुनाया था। उन्होंने यह शेर नेहरू और खादी के खिलाफ लिखा था। जिसके बाद सियासी गलियारे में काफी गर्मागर्मी हुई और उनके समर्थकों को आगबबूला कर दिया। तब मुंबई के तत्कालीन गर्वनर मोरारजी देसाई ने मजरूह की गिरफ्तारी का आदेश दिया था। इसके बाद उन्हें मुंबई के ऑर्थर रोड जेल में डाल दिया। इसके बाद उन्हें अपने लिखे गाने के लिए माफी मांगने को कहा। लेकिन मजरूह ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया। जिसके बाद उन्हें 2 साल तक जेल में रहना पड़ा था। हालांकि, जेल में भी अपनी कविताएं लिखनी नहीं छोड़ी। नतीजा ये कि अंत में थक हारकर मजरूह को जेल से रिहा करना पड़ा।

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Post Author: Soni

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