दिल अगर है तो दर्द भी होगा

कोई अटका हुआ है पल शायद,
वक्त में पड़ गया है बल शायद।

लब पे आई मेरी गजल शाय,द
वो अकेले हैं आज-कल शायद।

दिल अगर है तो दर्द भी होगा,
इस का कोई नहीं है हल शायद।

जानते हैं सवाब-ए-रहम-ओ-करम,
उन से होता नहीं अमल शायद।

आ रही है जो चाप कदमों की,
खिल रहे हैं कहीं कँवल शायद।

राख को भी कुरेद कर देखो,
अभी जलता हो कोई पल शायद।

चाँद डूबे तो चाँद ही निकले,
आप के पास होगा हल शायद।
■ गुलजार

Post Author: Soni

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